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प्रशिक्षण:बकरी पालन से पशुपालक होंगे समृद्ध, दो जिलों के 36 किसानों को मिल रही ट्रेनिंग

हरनौत13 दिन पहले
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प्रशिक्षण में शामिल पशुपालक। - Dainik Bhaskar
प्रशिक्षण में शामिल पशुपालक।
  • कृषि विज्ञान केंद्र में पटना व नालंदा जिले के किसानों को बकरी पालन पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है

बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर (भागलपुर) के तत्वावधान में कृषि विज्ञान केंद्र में पटना व नालंदा जिले के 36 किसानों को बकरी पालन पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यह प्रशिक्षण 14 जनवरी तक चलेगा। विषय वस्तु विशेषज्ञ डा. संजीव रंजन ने बताया कि पटना व नालंदा जिले के लिए जमुनापारी व सानन बकरियों के उपयुक्त प्रभेद हैं। इन्हें दूध व मांस के लिए पाला जाता है। उन्होंने बताया कि सामान्यतः दस बकरियों पर एक बकरा के हिसाब से पालन की परंपरा है। पर सरकारी स्तर से बकरी पालन योजना में 20 बकरी पर एक, 40 पर दो और सौ पर पांच बकरों के हिसाब से सहाय्य अनुदान मिलता है। इसमें साधारणतया 50 फीसदी और अनुसूचित जाति के लाभुकों को 75 फीसदी तक अनुदान दिया जाता है। बकरियों के साथ बकरे को रखने के तरीके पर भी विशेषज्ञ ने पशुपालकों को नसीहत दी। कहा कि बकरों में एक तेज गंध निकलती है। उसके साथ रखने पर बकरियों में भी वह गंध स्थायी हो जाती है। उन्होंने एक बकरे के लिए आठ गुणा छह फीट आकार के बथान बनाने का सुझाव दिया। प्राकृतिक गर्भाधान का समय होने पर दो बकरों को भी साथ रखने पर सख्त रूप से मना किया।
बकरीपालन की तीन विधियों की दी गयी जानकारी
प्रशिक्षण में बकरी पालन की तीन विधियों की भी जानकारी दी गई। उन्होंने कहा कि पहली विधि विचरण मुक्त पद्धति है। यह अधिकांशतः शहरी क्षेत्र में अपनायी जाती है। इसमें घर के अंदर अथवा छत पर बकरी पालन किया जाता है। चारा में फसल अवशेष और अनाज का दाना दिया जाता है। अर्द्ध विचरण क्षेत्र में पशुपालक उपलब्ध जमीन को चारागाह के रूप में इस्तेमाल करते हैं। बकरियां उसी चारागाह परिसर के अंदर ही रहती है। जबकि पूर्ण विचरण पद्धति ग्रामीण क्षेत्र में अपनायी जाती है। जहां वन क्षेत्र पाये जाते हैं। वहां बकरियां खुले में अपना चारा ग्रहण करती है।
गृहस्थी खेती के बूते संभव नहीं
सोहडीह की लालती देवी ने कहा कि बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और शादी-विवाह कर गृहस्थी चलाना सिर्फ खेती के बूते संभव नहीं है। इसी वजह से कृषि वैज्ञानिकों के संपर्क से हमें बकरी, गाय व मछली पालन का विकल्प मिला है। उसी के तरीके सीखने यहां आये हैं। कुछ ऐसे ही विचार घोसवरी के संतोष कुमार, सोहडीह के शैलेंद्र सिंह, नूर नगर की सुदीला सुभाष व अन्य किसानों के भी थे।

दूध के नाम पर बिकता है जहर, इसलिए सीख रहे गुर
फतुहा के सुजीत कुमार दूध के लिए बकरी पालन के गुर सीखने आये थे। उन्होंने कहा कि आज तो बाजार में दूध के नाम पर जहर बिकता है। उनका इशारा दूध को अधिक दिनों तक सुरक्षित रखने के लिए अपनायी जाने वाली तकनीक से था। इसी तरह सोहडीह के राजेश चंद्र दीपक ने बताया कि पिछले दिनों बाजार में आलू 40 रुपये प्रति किग्रा तक बिका। आज वही आलू चार सौ रुपये पैकेट बेचना पड़ रहा है। जब खेत से सारे आलू की हार्वेस्टिंग होगी तो रेट और भी गिरेगा। प्याज के साथ भी यही हुआ। पिछले दिनों यह 80 से 100 रुपये प्रति किग्रा बिका। जब किसानों की उपज तैयार हुई तो बाजार में उसकी कीमत धड़ाम से गिर गई। ऐसे में जब किसानों ने जैसे-तैसे प्याज को बाजार में खपा दिया तो अब पुनः उसके दाम बढ़ने शुरू हो गये। कृषि उत्पादों की कीमत बढ़ती है। पर, उसका लाभ उपजाने वालों को नहीं मिल पाता है। इसका लाभ कालाबाजारी की भेंट चढ़ जाता है। किसानों के पास जगह का भी अभाव होता है, जिससे वे उत्पादन को अधिक दिन तक सुरक्षित नहीं रख पाते हैं।

किसानी से परिवार चलाना संभव नहीं, बकरी पालन एक बेहतर विकल्प
बकरी पालन के गुर सीखने आये सोहडीह, बिहारशरीफ के किसान नरेंद्र कुमार ने बताया कि धीरे-धीरे कृषि योग्य रकबा कम रहा है। बहुत मेहनत कर फसल उपजाते भी हैं तो बाजार में सही कीमत नहीं मिल पाती है। अगली फसल लगाने को बीज, खाद आदि के लिए उपज व्यापारी के हाथ औने-पौने दाम में बेचनी पड़ती है। इसके मुकाबले हम एक बकरी भी पालते हैं तो वह एक वर्ष में पांच-छह बच्चे देती है। एक वर्ष बाद बाजार में उनकी अच्छी कीमत मिल जाती है। जबकि खेती में तो लागत निकालनी भी मुश्किल होती है।

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