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वर्ल्ड थैलेसीमिया डे:थैलेसीमिया अनुवांशिक रोग है जागरुकता से किया जा सकता है बचाव: सिविल सर्जन

जहानाबाद10 महीने पहले
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  • शिशुओं में चार से छह माह की उम्र में दिखने लगते हैं थैलीसीमिया के लक्षण

शु़क्रवार को दुनियाभर में वर्ल्ड थैलेसीमिया डे मनाया जा रहा है। यह दिन उनलोगों को समर्पित किया गया है, जो रक्त की इस अनुवांशिक रोग से पीड़ित हैं। थैलेसीमिया से बचाव के लिए बड़े पैमाने पर जनजागरूकता की जरूरत है। इस बीमारी का लक्षण भी कोरोना की तरह सांस की परेशानियों से जुड़ा है। इस वर्ष वर्ल्ड थैलिसिमिया डे 2020 का थीम ‘नए युग के लिए थैलिसिमिया का चित्रण वैश्विक प्रयासों के जरिए मरीजों को सस्ते एवं आसानी से उपलब्ध होने वाली नोबल थीरेपी’ है। सिविल सर्जन डा.विजय कुमार सिन्हा ने बताया कि इस जटिल रोग से उबरने के लिए लोगों को जागरूक होने की जरूरत है। इसके लिए जरूरी है कि इसके बारे में लोगों को जरूरी जानकारियां दी जा सके। स्वास्थ्य विभाग इस रोग के नियंत्रण के लिए लगातार काम कर रहा है। 
हीमोग्लोबिन बनाने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है थैलेसीमिया 
थैलेसीमिया एक अनुवांशिक रोग है। माता पिता दोनों में से किसी एक में जीन की गड़बड़ी होने के कारण यह रोग अगली पीढ़ी के सदस्यों को होता है। सीएस ने बताया कि इस बीमारी में लाल रक्त कोशिकाओं में हीमोग्लोबिन नहीं बनता है। खून में पर्याप्त स्वस्थ्य लाल रक्त कोशिकाएं नहीं होने के कारण शरीर के अन्य हिस्सों को ऑक्सीजन नहीं मिल पाता है। इससे पीड़ित बहुत जल्द थक जाता है। उसे सांस की कमी महसूस होती है। कोरोना काल में ऐसे मरीजों को बचने की जरूरत है क्योंकि इस बीमारी में भी कोरोना की तरह सांस लेने में ही परेशानी होती है। 

इन लक्षणों से की जाती है थैलेसीमिया की पहचान: शिशुओं में चार से छह माह की उम्र में थैलीसीमिया के लक्षण नजर आने लगते हैं। इन्हें इन लक्षणों से पहचाना जा सकता है। बच्चों का शरीर पीला पड़ जाता है। शिशु का मानसिक विकास में रूकावट होता है तथा शारीरिक विकास भी क्षीण हो जाता है। बच्चे के लीवर व तिल्ली प्रभावित होने लगता है और सांस लेने में तकलीफ होने लगती है। जाहिर है कि कोरोना संक्रमण से बचने के लिए संबंधित रोगियों को ऐसे में अपेक्षाकृत कही ज्यादा एहतियात बरतने की जरूरत है। 

सालाना 10 हजार थैलिसीमिया ग्रस्त बच्चे लेते हैं जन्म: केयर इंडिया के मातृ स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ प्रमोद ने बताया थैलेसिमिया एक गंभीर रोग है जो वंशानुगत बीमारियों की सूची में शामिल है. प्रत्येक वर्ष लगभग दस हजार थैलिसीमिया से ग्रस्त बच्चे का जन्म होता है। बिहार में लगभग दो हजार थैलेसीमिया मेजर से ग्रस्त मरीज हैं, जो नियमित ब्लड ट्रांसफयूजन पर आधारित है।

थैलीसीमिया पीड़ितों के लिए आज लगेगा रक्तदान शिविर

 लॉकडाउन में ब्लड बैंकों में रक्त की भारी कमी है। जहानाबाद समेत पूरे बिहार के ब्लड बैंक में रक्तदाता कम पहुंच रहे हैं। ऐसे में थैलीसीमिया पीड़ित बच्चों और जरूरतमंदों को ध्यान में रखकर थैलीसीमिया दिवस पर रक्तदान शिविर का आयोजन सदर अस्पताल स्थित ब्लड बैंक में शुक्रवार को किया जा रहा है। जिले में रक्तदान के क्षेत्र में सक्रिय संस्था रक्त सेवा के अध्यक्ष रजनीश कुमार विक्कू ने बताया कि थैलीसीमिया दिवस पर पूरे बिहार में भारत सरकार द्वारा तय मापदंडों को पूरा करते हुए सोशल डिस्टेंस को ध्यान में रखकर बिहार के सभी ब्लड बैंकों में रक्तदान किया जाएगा। मां वैष्णो देवी सेवा समिति के तत्वावधान में पूरे बिहार में हो रहे इस मेगा ब्लड डोनेशन ड्राइव में रक्तसेवा के सदस्य भी जहानाबाद में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेंगे।

दंपति अपने खून की नियमित जांच जरूर कराएं 
विशेषज्ञों का मानना है कि विवाहित दंपतियों को अपने खून की नियमित जांच का अधिक ख्याल रखना चाहिए। यदि पति या पत्नी दोनों में से किसी को भी थैलीसीमिया है तो डॉक्टर से बात कर परिवार बढ़ाने की योजना बनानी चाहिए। इससे बच्चों में यह बीमारी होने की संभावना को समझने में आसानी होगी। थैलेसीमिया से इस प्रकार  भी बचाव किया जा सकता है।  इसके लिए खून की जांच कर रोग की मौजूदगी की पुष्टि कराना चाहिए। साथ ही विवाह से पूर्व लड़का व लड़की के रक्त का परीक्षण भी किया जाना चाहिए। कई समुदायों में नजदीकी रिश्ते में शादी विवाह होते हैं. ऐसे नजदीकी रिश्ते में विवाह संबंध बनाने से परहेज किया जाना ही बेहतर होता है।

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