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संरक्षण:प्राकृतिक संरक्षण के लिए है पवित्र माध्यम है छठ की पौराणिक परंपराएं

जहानाबाद13 दिन पहले
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छठ पर्व के अनुष्ठान के दौरान हरे कच्चे बांस की बहंगी, मिट्टी का चूल्हा, प्रकृति प्रदत्त विभिन्न प्रकार के फल, सब्जी, ईख सहित कई अन्य चीजों के उपयोग का विधान है। जो आमजनों को प्रकृति की ओर लौट चलने की प्रेरणा देता है। पर्व के दौरान मिट्टी के बर्तन पर हाथी की आकृति बनाने की परंपरा भी जैव संरक्षण की प्रेरणा प्रदान करती है।छठ पर्व में अ‌र्घ्य प्रदान करने की महत्ता भी सर्वविदित है। इतना ही नहीं महापर्व छठ विलुप्त हो रहे तालाब, नहर, पोखर व नदियों को नया जीवन प्रदान करने को प्रेरित करता है। जो प्राकृतिक संतुलन के लिए काफी महत्वपूर्ण है। जबकि वन संरक्षण में भी उक्त महापर्व की भूमिका सर्वोपरि है। पवित्रता व स्वच्छता का देता है संदेश महापर्व छठ पवित्रता व स्वच्छता का खास संदेश देकर आम जीवन में साफ-सफाई व स्वच्छता की भावना को जागृत करती है।

यही कारण है कि उक्त महापर्व में पवित्रता व स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है। छठ पूजा में कच्ची हल्दी, आदी, पान, दूध, सुपाड़ी, सिघाड़ा, सुथनी, सकरकंद आदि चढाकर भगवान सूर्य को अ‌र्घ्य अर्पित किया जाता है। उक्त सारी चीजें स्वच्छ एवं पवित्र मानी जाती है। समाजिक समरसता को देता है बढ़ावा पर्व सामूहिकता के साथ-साथ सामाजिक समरसता को भी बढ़ावा देता है। हर वर्ग के लोग इसमें बढ़-चढ़ कर भाग लेते हैं। आयोजन में विघ्न न हो इसके लिए तालाबों, नदी के घाटों व सड़क की साफ-सफाई से लेकर रोशनी प्रबंधन की जिम्मेदारी भी आमलोग सामूहिकता के साथ निर्वहन करते हैं।

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