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स्मृति शेष:साधारण वेशभूषा में असाधारण व्यक्तित्व के धनी थे गणेश विद्यार्थी

नवादा6 दिन पहले
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  • गणेश शंकर विधार्थी अपने जीवन में छह बार गए थे जेल, हार से नही घबराते थे, जीवन में दो बार जीते थे चुनाव, लेकिन लगातार लड़ते रहे चुनाव, एक दफा बनाए गए थे एमएलसी

1952 में बिहार के रजौली विधान सभा के दो सीटों पर चुनाव था। एक सीट एससी के लिए सुरक्षित था। दूसरा सीट सामान्य था। सामान्य सीट पर कांग्रेस से राधाकृष्ण सिंह यादव और भाकपा से गणेश शंकर विधार्थी उम्मीदवार थे। विधार्थी का पूरा परिवार कांग्रेसी थे। परिजन उन्हें दूसरे सीट पर लड़ने का दबाव बना रहे थे। लेकिन विधार्थी पार्टी के फैसले पर डटे रहे। हालांकि 2000 मतों के अंतर से हार गए। यही नहीं, 1957 और 1962 में भी दूसरे स्थान पर रहे। 1967 में जब रजौली सुरक्षित हो गया तब नवादा से चुनाव लड़े।

दूसरे स्थान पर रहे। 1969 में भी दूसरे स्थान पर रहे। 1972 में नहीं लड़े। 1977 में लगातार पांच दफा हार के बाद पहली जीत हुई। 1980 में दोबारा निर्वाचित हुए। लेकिन 1985, 1990 में हार गए। 1995 में नही लड़े। 2000 में हिसुआ से लड़े। हार गए। 2009 का लोकसभा चुनाव भी हार गए। जदयू लीडर मुकेश विधार्थी कहते हैं कि- गणेश दा मानते थे कि चुनाव में हार सिर्फ उनकी नही होती थी। कार्यकर्ताओं की भी होती थी।

विधार्थी से कैसे बन गए प्रख्यात राजनीतिक
1937 में आठवीं की पढ़ाई के लिए नवादा के जार्ज कारनेशन इंगलिश हाई स्कूल (अब गांधी इंटर स्कूल) मंे दाखिला हुआ था। कुछ साथियों के साथ मिलकर विधालय में भारत का तिरंगा झंडा फहरा दिया था। प्रतिक्रिया में तत्कालीन एसडीओ ने विधालय का अनुदान रोक दिया था। फिर आंदोलन की राह पर चल दिए। पूर्व विधायक नरेंद्र कुमार कहते हैं कि गणेश शंकर विधार्थी स्वतंत्रता आंदोलन और किसान आंदोलन में अहम भूमिका निभाए थे। वे जन नेता थे। वे जीतने के लिए नहीं, वे जन मुददे के लिए चुनाव लड़ते थे।
लगातार पांच हार के बाद मिली थी जीत

रजौली डेउढ़ी पर निवासी विधार्थी 97 साल के जीवन काल में छह दफा जेल गए। करीब सात साल जेल में बिताए। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के समय एक साल जेल में रहे। 1944 में एक जुलूस के कारण एक माह जेल में रहे। 1946 में कैदियों की रिहाई आंदोलन के कारण चार माह जेल में रहे। 1948 में उनके पार्टी संगठन को गैर कानूनी घोषित कर दिया गया था। फिर 1962 में करीब चार माह जेल में रहे। 1964 में सीपीआई से अलग सीपीएम अलग बनी तब नजरबंद रहे थे। 1965 में सुप्रीम कोर्ट में अपनी पैरवी करने खुद गए थे तब गिरफ्तार कर लिए गए थे। तब ढाई साल तक जेल में रहे। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय सेनानी रहे। पर वे पेंशन नही ली।

मुश्किल से हुई थी ग्रेजुएशन की पढ़ाई
1940 में विधार्थी दसवीं की परीक्षा देनेवाले थे। तभी उन्हें फोर्स टीसी दे दिया गया था। लिहाजा, पटना से 1 साल बाद मैट्रिक पास हुए। इंटर के लिए बीएन काॅलेज में दाखिला लिया। 1942 में जेल गए। लिहाजा, 1944 में इंटर पास किए। 1947 में ग्रेजुएशन किया। फिर 1948 में जेल गए। इसके बाद अंग्रेजी विषय से पीजी करने के लिए पटना यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। 1954 में जब परीक्षा का समय आया तब विभाग के प्रोफेसर से मतभेद हो गया। लिहाजा, परीक्षा छोड़ दी। हालांकि विधार्थी लाॅ की डिग्री ली।
पारिवारिक पृष्ठभूमि : पिता भागवत प्रसाद सिंह बड़े किसान थे। विधार्थी के तीन बेटे और दो बेटियां हैं। बेटे डॉ. रविशंकर चिकित्सक हैं। भास्कर शंकर पटना हाइकोर्ट में अधिवक्ता हैं। जबकि भानू शंकर को नौकरी लगी थी, लेकिन छोड़ दी।

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