नीतीश सबकी मजबूरी क्यों:सुशासन बाबू के पास बिहार में 16% वोट की गारंटी, UP में 6% वोट पर असर; जिसके साथ रहे उसे फायदा

पटना4 महीने पहलेलेखक: आस्तिक पाराशर

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने देश की सबसे बड़ी पार्टी BJP से नाता तोड़कर एक बार फिर RJD से हाथ मिला लिया। नीतीश का यह कदम चौंकाने वाला था। नीतीश आठवीं बार बिहार के CM बने, लेकिन BJP राज्य की सत्ता से ही बेदखल हो गई। इतना ही नहीं, अब उसके सामने 2024 के लोकसभा चुनाव की टेंशन भी खड़ी हो गई है। ऐसा इसलिए, क्योंकि आंकड़े बताते हैं कि नीतीश जिसके साथ रहे, उसका पलड़ा भारी रहता है।

ऐसे में सवाल उठता है कि नीतीश के पास ऐसी कौन सी ताकत है, जो कम विधायक होने पर भी CM की कुर्सी पर वही कायम रहते हैं। वे जिस पार्टी के साथ जाना चाहते हैं, वही उनके एक इशारे पर साथ आने तैयार हो जाती है। इसके पीछे की बड़ी वजह है पार्टियों की मजबूरी, क्योंकि नीतीश का साथ होना बिहार के 16 प्रतिशत कुर्मी वोट की गारंटी है।

बिहार में 16% वोट की गारंटी हैं सुशासन बाबू
विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव। हमेशा नीतीश कुमार का वोट प्रतिशत अच्छा ही रहा है। विभाजित बिहार के बाद हुए लोकसभा चुनावों के आंकड़ों को देखें तो नीतीश कुमार का विधानसभा की तुलना में लोकसभा चुनाव में ट्रैक रिकार्ड ज्यादा बेहतर है। 2014 लोकसभा चुनाव को छोड़कर कभी उनका वोट प्रतिशत 22% से नीचे नहीं रहा है। नीतीश को 2014 की मोदी लहर में भी 16% वोट मिले थे।

बिहार के साथ UP के 6% वोट पर नीतीश का असर
कुर्मी समाज से आने वाले नीतीश कुमार बिहार के 16% वोट पर तो असर है ही, वे उत्तर प्रदेश में भी BJP का गणित बिगाड़ सकते हैं। UP में कुर्मी समाज का वोट करीब 6 प्रतिशत है। इनका प्रभाव प्रदेश के 25 जिलों में है। जबकि करीब 48 विधानसभा सीटें और 8-10 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां कुर्मी समाज निर्णायक भूमिका निभाता है।

UP में सपा नेता बेनीप्रसाद वर्मा और अपना दल के सोनीलाल पटेल के बाद कुर्मी समाज से कोई बड़ा चेहरा किसी भी पार्टी के पास नहीं है। BJP सोने लाल पटेल की बेटी अनुप्रिया पटेल के सहारे कुर्मी समाज को साधे हुए है, जबकि देश में कुर्मी नेता के तौर पर नीतीश कुमार खुद को स्थापित कर चुके हैं। ऐसे में आने वाले समय में नीतीश कुमार अकेले या कांग्रेस के साथ मिलकर UP में कुर्मी समाज के वोट बैंक को अपनी तरफ करना चाहेंगे।

विपक्षी नेताओं से भी नीतीश के अच्छे संबंध
नीतीश कुमार के महागठबंधन में शामिल होने के बाद विपक्ष में खुशी का माहौल है। इसकी वजह है नीतीश के अन्य राज्यों के नेताओं के साथ अच्छे संबंध होना। नीतीश के पश्चिम बंगाल की CM ममता बनर्जी, तेलगांना के CM के चंदशेखर राव, ओडिशा के CM नवीन पटनायक और कर्नाटक के वरिष्ठ नेता एचडी देवेगौड़ा से अच्छे संबंध हैं। यही वजह है कि नीतीश के महागठबंधन में शामिल होने के बाद विपक्ष और मजबूत हो गया है। ऐसे में अगर 2024 में विपक्ष एक साथ लोकसभा चुनाव लड़ता है, तो नीतीश कुमार ज्यादातर राज्यों में कुर्मी वोट बैंक के सहारे विपक्ष को मजबूती प्रदान करेंगे।

भाजपा क्यों नहीं छोड़ना चाह रही थी साथ…
साल 2019 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने जैसे ही BJP से हाथ मिलाया NDA का वोट शेयर करीब 18% बढ़कर 54.34% हो गया। प्रदेश की 40 सीटों में से NDA को 39 सीटें मिली और विपक्ष से सिर्फ कांग्रेस 1 सीट ही जीत सकी थी। यही वजह है कि भाजपा 2024 के लोकसभा चुनाव में किसी भी हाल में नीतीश का साथ नहीं छोड़ना चाहती थी।

अगर महागठबंधन के साथ लोकसभा चुनाव तक रहा तो…
नीतीश अगर महागठबंधन में शामिल रहते हैं तो 2024 के लोकसभा चुनाव में NDA को कम नुकसान हो सकता है, क्योंकि पिछले 4 चुनावों का ट्रैक रिकार्ड देखें तो पता चलता है कि राज्य में जिसकी भी सरकार रही है, सिर्फ 2014 को छोड़कर लोकसभा चुनाव में उस पार्टी का डंका बजा है। जैसे 2004 में राबड़ी देवी CM थीं तो UPA की झोली में 40 में से 29 सीटें गईं। 2009 में नीतीश NDA के साथ रहे तो उसकी 32 सीटें मिलीं। 2019 में दोबारा उनके साथ जाने पर NDA को 39 सीटें मिलीं।

  • अगर एक बार फिर राज्य में पिछड़ा, अति पिछड़ा और दलित वोटों की गोलबंदी होगी। इससे BJP की स्थिति 2015 वाली हो सकती है।

अकेले लड़े तो 16.04%, अब महागठबंधन के साथ हैं
साल 2014 के लोकसभा चुनाव में JDU अकेले लड़ी और 16.04% वोट लाने में कामयाब रही। तब पार्टी को 2 सीट मिली थीं और मोदी लहर में 36.48% वोट पाकर NDA 31 सीटों पर जीती थी, लेकिन BJP को पता है कि उनको इतनी बड़ी जीत तब मिली थी जब मुकाबला त्रिकोणीय हुआ था। अब नीतीश फिर अकेले लड़ेंगे, ऐसे आसार कम ही हैं। वजह- इस बार उनके साथ महागठबंधन है। खुद राजद के तेजस्वी ने कहा है कि महागठबंधन में जो नीतीश जी चाहेंगे वही होगा।

विधानसभा चुनाव पर पड़ने वाले प्रभाव को भी जानिए
बीते विधानसभा चुनावों के आंकड़ों भी ज्यादा अलग नहीं है। अगर आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि नीतीश कुमार के साथ जाने वाली पार्टियों के वोट शेयर में तो मामूली बढ़ोत्तरी होती है, लेकिन सीटों में भारी इजाफा हो जाता है।

जैसे 2015 और 2020 विधानसभा चुनाव को देख लीजिए। 2015 में नीतीश कुमार ने लालू यादव और कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। तब महागठबंधन (JDU+RJD+कांग्रेस) को 41.84% वोट मिला और सीटें 178 पहुंच गईं। वहीं, NDA 34.59% वोट पाकर 58 सीट पर सिमट गई, लेकिन 2020 में जैसे ही BJP ने नीतीश कुमार से हाथ मिलाया NDA 37.26% वोट शेयर के साथ 125 सीट जीतने में कामयाब रही। जबकि, महागठबंधन (RJD+कांग्रेस+CPI+CPIM+माले) का वोट शेयर NDA से सिर्फ 0.23% ही कम था, लेकिन उससे सीटें 15 कम हो गईं।