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26 साल बाद मिला न्याय:पटना में पति की मौत के बाद उनके बकाया वेतन के लिए लड़ी; किसी ने नहीं सुनी तो हाईकोर्ट पहुंची

पटना5 महीने पहलेलेखक: अरविंद उज्ज्वल
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26 साल के बाद एक विधवा लीलावती मिश्रा को मिला न्याय। सरकारी सेवा से 1996 में मुंगेर से रिटायर होने के बाद कृष्ण कुमार मिश्रा अपने बकाया वेतन और सेवानिवृत्ति लाभ के लिए अधिकारियों के यहां गुहार लगाते रहे, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई और वे चल बसे। उनके निधन के बाद उनकी विधवा पत्नी ने भागदौड़ शुरू की। उनकी बात भी किसी ने नहीं सुनी। अंततः उन्होंने पिछले साल पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

चीफ जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एस कुमार की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने संवैधानिक प्रावधानों के साथ ही सुप्रीम कोर्ट के अनेक फैसलों का हवाला देकर मृत सरकारी कर्मी की विधवा के पक्ष में अपना फैसला दिया। कोर्ट ने उनके मृत पति के बकाया वेतन और सेवानिवृत्ति लाभ का भुगतान 18 प्रतिशत ब्याज के साथ दो माह के भीतर करने का आदेश दिया।

इसके अलावा कोर्ट ने सरकार को बतौर मुआवजा पांच लाख रुपए का भुगतान भी करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने सरकार को इस बात की छूट दी है कि वह मुआवजे की राशि की वसूली संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मियों से कर सकती है।

कोर्ट ने राज्य सरकार को कर्मियों की शिकायत के निवारण के लिए एक वेब पोर्टल बनाने का आदेश दिया ताकि कोई भी कर्मी अपनी शिकायत दर्ज करा सके। कोर्ट ने राज्य के महाधिवक्ता को बिहार लिटिगेशन पॉलिसी को अच्छी तरह लागू करने के लिए सभी विभागों के प्रधान सचिव व सचिव के साथ बैठक करने को कहा ताकि पॉलिसी को प्रभावी ढंग से अमल में लाया जा सके। बुधवार को खंडपीठ ने लीलावती मिश्रा की याचिका को निष्पादित करते हुए अपने 38 पन्नों के फैसले में संविधान के अनुच्छेद 21 का विस्तार से उल्लेख किया और कहा कि संविधान सबको गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है।

सृजन घोटाला में सात आरोपियों की जमानत याचिका खारिज

पटना के जिला एवं सत्र न्यायाधीश और प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के विशेष न्यायाधीश सुनील दत्त मिश्रा ने सृजन घोटाले से जुड़े मामले के सात आरोपियों की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी। विशेष न्यायाधीश ने मामले में सुनवाई के बाद अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था। विशेष न्यायाधीश ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लाॅन्ड्रिंग एक्ट के तहत आरोपी बनाए गए पीके घोष, विपिन कुमार, जयश्री ठाकुर, संत कुमार सिन्हा, अमरेंद्र कुमार यादव, अरुण कुमार और देवशंकर मिश्रा को नियमित जमानत पर मुक्त करने से इनकार कर दिया।