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सफलता के सूत्र:माता-पिता, शिक्षक के साथ, प्रेरक साहित्य भी व्यक्तित्व विकास में है सहयोगी

10 महीने पहले
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  • कोरोना संकट के बीच विपरीत परिस्थितियों में सफलता के सूत्र सुपर-30 के आनंद कुमार के शब्दों में

टेलीविजन और कंप्यूटर को छोड़ते ही नहीं हैं मेरे बच्चे। जब देखो मोबाइल पर गेम खेलते रहते हैं। छोटी-छोटी बातों पर झुंझला जाते हैं। माता-पिता का तो सम्मान ही करना भूल गए हैं। बच्चों को कैसे सुधारा जाए? समाधान के उद्देश्य से आजकल अक्सर मेरे पास ऐसे सवाल आते रहते हैं। अपनी व्यस्तताओं में घिरे माता-पिता, चाहे वह नौकरीपेशा हों या व्यवसायी, बच्चों के प्रति जिम्मेदारी नहीं समझते। 

आजकल खुद सोशल-मीडिया, टेलीविजन और व्हाट्सएप पर लगातार व्यस्त रहने वाले माता-पिता उम्मीद करते हैं कि उनके बच्चे बिना किसी भटकाव के पढ़ाई में मन लगाएं और जीवन में कुछ बड़ा करें। महंगे स्कूल में एडमिशन करवाने का अर्थ यह नहीं है कि आप जिम्मेदारियों से मुक्त हो गए। उनके पास बच्चों की मानसिक, बौद्धिक, रचनात्मक क्षमताओं को जानने का समय नहीं है। उससे भी बड़ी बात, वे उसे पहचानने की चेष्टा ही नहीं करते।

अधिकांश माता-पिता अपनी इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और सपनों को बच्चों पर थोपने की भारी गलती कर बैठते हैं, उनके विचारों एवं रुचियों को सम्मान नहीं देते। उनके बाल-सुलभ क्रिया-कलापों पर हर समय रोक लगाते हैं। यह सब उनके विकास की धारा को अवरुद्ध कर देता है। और इन्हीं कारणों के चलते बच्चे माता-पिता की बातों का सम्मान नहीं करते हैं और बेवजह जिद्दी बनते जा रहे हैं।

दरअसल हर बच्चा अनगढ़ पत्थर की तरह है। उसके भीतर सुंदर मूर्ति छिपी होती है। उस खूबसूरत सी मूर्ति को सिर्फ शिल्पकार की ही आंखें देख पाती हैं। और बच्चों के ये शिल्पकार हैं-माता-पिता, शिक्षक और समाज, जो हर बच्चे को संवारकर खूबसूरत व्यक्तित्व प्रदान करते हैं। बच्चों के विकास में यदि ये शिल्पकार थोड़े से भी असावधान हो जाएं तो सुंदर मूर्ति खंडित होते भी देर नहीं लगती। हमें इस असावधानी के बारे में गहराई से सोचना होगा कि कहीं हमारा अतिवाद घातक तो नहीं है। 

कहीं हम जरा-जरा सी गलती पर उन्हें अपमानित, दंडित और प्रताड़ित कर उनके आत्मविश्वास को ठेस तो नहीं पहुंचा रहे या उन्हें अति सुरक्षा प्रदान कर उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व के विकास में बाधक तो नहीं बन रहे। मेरे पास ऐसे तमाम उदाहरण हैं, जहां माता-पिता और अभिभावकों ने ऐसी भूल की है, जिसका परिणाम त्रासदी के रूप में दिखा। कहीं माता-पिता के भय से बच्चे ने आत्महत्या की तो कहीं शिक्षक की मार से बचने के लिए बच्चा स्कूल न जाकर कहीं और जाने लगा और धीरे-धीरे वह ड्रग माफिया के चंगुल में फंस गया। ये दोनों ही स्थितियां अतिवादी हैं। अति सुरक्षा के कारण बच्चे अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं बना पाते। वे न तो निर्णय ले पाते हैं और न ही किसी समस्या का समाधान खोज पाते हैं। छोटी-से-छोटी और बड़ी समस्या के लिए वे अपने माता-पिता पर निर्भर रहते हैं फिर चाहे वह स्कूल का बैग उठाना हो, पानी पीना हो, खाना खाना हो या फिर पार्क में जाकर खेलना। माता-पिता अपने मन में एक काल्पनिक दुर्घटना की छवि बना लेते हैं और उन्हें लगता है कि उनके बच्चे के साथ भी ऐसा हो सकता है। इसलिए वे हर समय उसे अपने साथ रखना चाहते हैं।

उनके विकास के लिए घर में माता-पिता, विद्यालय में शिक्षक के समानांतर ही समाज की हर इकाई, बालसेवी संस्थाएं, बाल फिल्में, प्रेरक साहित्य सभी की संयुक्त भूमिका होती है। इनमें से एक की भी भूमिका विघटित होने से बच्चों का सामाजिक दृष्टि से विकास अवरुद्ध हो जाता है और व्यक्तित्व कुंठित। बच्चे के व्यक्तित्व-निर्माण की पहली पाठशाला माता-पिता ही हैं। उसमें भी मां की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण है। अगर माता-पिता अपने बच्चों से प्रेम करते हैं और प्रेम की अभिव्यक्ति भी करते हैं, तो बच्चे पर इसका सकारात्मक असर पड़ता है। बच्चों से हमेशा दोस्त की तरह व्यवहार करें। उनको इतना कम्फर्ट देने का प्रयास करें ताकि वे अपनी तमाम बातों को, समस्याओं को आपके साथ शेयर कर सकें। 

किसी भी बात को कहने में हिचकिचाहट नहीं हो। मन में उसके कोई गुबार न रहे। जो भी वह जीवन में करना चाहता हो खुलकर आपसे बात कर सके। उसके प्रत्येक कार्य में रुचि लेना, उसकी इच्छाओं का सम्मान करना ही अपने प्रेम को प्रकट करना है। इस तरह बच्चों में उत्तरदायित्व, सहयोग, सद्भावना आदि सामाजिक गुणों का विकास होता है और फिर वह समाज के संगठन में अपनी एक महत्त्वपूर्ण जगह बना लेता है। अगर घर में सहयोग का वातावरण है तो बच्चों में इन गुणों का विकास भलीभांति होगा। कहने का मतलब यह है कि बच्चे के नैतिक विकास में पारिवारिक एवं सामाजिक परिवेश का बहुत बड़ा महत्व होता है। अगर आप अपने बच्चों की भावनाओं का खयाल रखेंगे, उनको अपना क्वालिटी टाइम देंगे, अपना सबसे अच्छा दोस्त समझेंगे तब आने वाले समय में बच्चे आपके अधूरे सपनों में रंग जरूर भरेंगे।

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