विपरीत परिस्थितियों में जीत की कहानी / अपने सपनों के साथ, जो दूसरों के सपनों के लिए भी मेहनत करें वे हैं सच्चे विजेता

Along with your dreams, those who work hard for the dreams of others are the true winners
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Along with your dreams, those who work hard for the dreams of others are the true winners

  • कोरोना संकट के बीच विपरीत परिस्थितियों में जीत की कहानी सुपर-30 के आनंद कुमार के शब्दों में

दैनिक भास्कर

Jun 30, 2020, 05:10 PM IST

यह एक ऐसे छात्र की प्रेरक कहानी है, जिसने तमाम मुश्किलों से पार पाते हुए पहले तो अपनी कामयाबी का परचम लहराया और अब उतनी ही लगन और जिम्मेदारी के साथ दूसरे जरूरतमंद छात्रों की कॅरिअर बनाने में मदद करने के लिए तैयारी कर रहा है।

सर्दी का मौसम था। खुले आसमान के नीचे खिली धूप में लगी वह क्लास मुझे सिर्फ अमरेंद्र के कारण अब तक याद है। मैं बच्चों को कठिन से कठिन सवाल दे रहा था। सबसे पहले उत्तर देने की होड़ लगी थी। इसमें अमरेंद्र सबसे आगे था। न कोई कैलकुलेशन, न रफ वर्क। आत्मविश्वास से परिपूर्ण अमरेंद्र एक सवाल पर अटका। सवाल या यूं कह लें, सिर्फ एक शब्द पर-‘कार्पेट।’ उसने मुझसे आकर पूछा, सर इसका अर्थ क्या है? मैंने बताया-दरी। तब उसे इसका अर्थ पता चला।

अंग्रेजी के एक मामूली शब्द पर उसका अटकना मुझे खटका। लाखों दूसरे विद्यार्थियों की तरह अंग्रेजी का अज्ञान उसकी मजबूरी थी। वह गरीबी में पढ़कर आगे आया था। सरकारी स्कूल से पढ़ाई शुरू करने वाले अमरेंद्र का अंग्रेजी से पहला सामना हुआ छठवीं क्लास में। न ट्यूशन का विकल्प। न घर में कोई समझाने वाला। अपने बलबूते पर उसने 2002 में अच्छे अंकों से बारहवीं की परीक्षा पास की। तभी उसने पहली बार आई.आई.टी. का नाम सुना। वह पटना में मुझसे मिला। लक्ष्य के लिए उसके गहरे आत्मविश्वास की झलक उसके साथ हुई पहली ही मुलाकात में मुझे दिख गई। अंग्रेजी से अनभिज्ञ अमरेंद्र ने जल्दी ही खुद को सुपर 30 में पाया। एक दिन मुंबई के एक प्रोफेसर का लेक्चर था। वह फिर किसी शब्द पर अटक गया। प्रोफेसर का भी ध्यान इस कमजोर कड़ी पर गया। संदेह के साथ अकेले में उन्होंने पूछा, यह बच्चा कैसे आई.आई.टी. कर पाएगा?

आखिर में अमरेंद्र ने ही बाजी मारी। वर्ष 2004 में उसने अंग्रेजी माध्यम में पढ़े बच्चों को पीछे छोड़ते हुए अच्छी रैंक से आई.आई.टी. प्रवेश परीक्षा पास की। खड़गपुर आई.आई.टी. की पहली क्लास में सभी ने उसकी दमदार आवाज सुनी-‘माई नेम इज अमरेंद्र कुमार।’ वहां बाकी विद्यार्थी बड़े घरों और कान्वेंट स्कूलों के थे। बचपन से ही अंग्रेजी के अभ्यस्त और छठवीं से ही आई.आई.टी. में जाने के लिए तैयारी की मजबूत मानसिकता वाले। इनके आगे टिकने के लिए अमरेंद्र को जी-तोड़ प्रयास करने पड़े। उसने व्याकरण सीखी, हॉलीवुड की फिल्में देखीं, अंग्रेजी के अखबार पढ़े। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी का 90 फीसदी हिस्सा दिमाग में उतारा। फिर 2008 में पढ़ाई पूरी करने के बाद टाटा मोटर्स में पहली नौकरी की और नतीजा दो साल में तीन प्रमोशन।

गांव गया तो दूसरों की नजर में बड़ा आदमी था। लोग अपने बच्चों की नौकरियों की आस लगाए आकर मिलते। मगर अपनी सीमाएं सिर्फ वही जानता था। उसने एक कंपनी शुरू करने का विचार तो किया मगर इतना पैसा या प्रबंधन का ज्ञान उसे नहीं था। अब उसने कैट की तैयारी शुरू की। 2012 में आई.आई.एम. बेंगलुरू में उसका चयन हुआ। सबसे बड़ी बात यह है कि अपनी सफलता के बाद, वह गांव के अपने ही जैसे दूसरे बच्चों के लिए कुछ करना चाहता है। अमरेंद्र के आत्मविश्वास, मेहनत, लगन और सफलता ने मुझे उतना प्रभावित नहीं किया, जितना इस उम्र में उसके दूसरों के लिए कुछ करने के विचार ने। प्रबंधन की डिग्री के बाद गुरुग्राम में अभी वह एक बहुत बड़ी कंपनी में बड़ी जिम्मेदारी निभा रहा है। अब वह दूसरों के सपनों में भी रंग भरने में मददगार साबित हो रहा है। गांव में बच्चों को पढ़ाने की योजना पर काम कर रहा है। आज हमारे आसपास ऐसे कितने कामयाब युवा हैं, जो दूसरों के लिए कुछ करने के सपने देख रहे हैं?

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