कामयाबी / उधार की किताबों से की पढ़ाई, लेकिन हार नहीं मानी, आईआईटी में पाया दाखिला, अब एमएनसी में जॉब

फाइल फोटो। फाइल फोटो।
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फाइल फोटो।फाइल फोटो।

  • मां रेणुका देवी की इच्छा थी- बच्चे पढ़-लिख जाएं, खुद कभी स्कूल नहीं गईं, लेकिन बच्चों को सुबह स्कूल भेजने में कोताही नहीं बरती
  • जब बच्चा दसवीं में पहुंचा तो पिता ज्यादा बीमार रहने लगे, अकेली मां को सहारा देने के लिए उसे दुकान में भी समय देना पड़ा

दैनिक भास्कर

Mar 26, 2020, 08:59 AM IST

पटना. बिहार के समस्तीपुर जिले के पटोरी गांव में रहते थे धनंजय के पिता शशिकांत महतो। गांव में मजदूरी कर पेट पालते थे, लेकिन जब छह बच्चे हो गए तो कमाई कम पड़ने लगी। वे गुजरात के सूरत शहर चले गए। कपड़ा मिल में काम करने लगे। दोनों शिफ्ट में काम करते, जिससे ज्यादा पैसा बच्चों के लिए भेज सकें। लेकिन कुछ साल बाद वे इतने बीमार रहने लगे कि काम करना मुश्किल हो गया। वे चौबीसों घंटे रुई के बीच में रहते थे और उड़ती हुई रुई उनके फेफड़े को खराब कर रही थी। एक दिन मालिक ने तरस खाते हुए दस हजार रुपए उन्हें दिए और गांव जाने को कह दिया।


मां रेणुका देवी की बड़ी इच्छा थी कि बच्चे किसी तरह पढ़-लिख जाएं। खुद कभी स्कूल नहीं गईं, लेकिन बच्चों को सुबह स्कूल भेजने में कोई कोताही नहीं करती थी। गांव के उस सरकारी स्कूल में पढ़ाई अच्छी नहीं होती थी, लेकिन दूसरा विकल्प भी नहीं था। धनंजय छठी कक्षा में था जब पिता सूरत से लौट आए। मजदूरी करना अब संभव नहीं था, तो उन्हीं दस हजार रुपयों से शशिकांत ने दुकान खोल ली। दुकान इतनी छोटी थी कि बाहर से दिखती भी नहीं थी। धनंजय खूब मेहनत करता। उसे कभी इतने पैसे नहीं मिले कि नई किताबें खरीद सके। किसी से पुरानी किताबें उधार लेकर किसी तरह वह अपना काम चलाता था। दुकान में जिस दिन बिक्री नहीं होती, उस दिन भूखे पेट सोने की मजबूरी होती थी।

बच्चों को भूखा देख रेणुका देवी की आत्मा कराह उठती, लेकिन उनके हाथ में कुछ नहीं था। वे बच्चों को समझातीं कि इस गरीबी से निकलने का एक ही जरिया है, पढ़ाई और सिर्फ पढाई । धनंजय को उनकी बात बचपन में ही समझ आ गई थी। जब वह दसवीं में पहुंचा तो पिता ज्यादा बीमार रहने लगे और अकेली मां को सहारा देने के लिए उसे दुकान में भी समय देना पड़ता। फिर भी वह अच्छे अंकों से दसवीं पास हुआ और अब आगे पढ़ाई की चुनौती थी। इसी दौरान धनंजय के शिक्षक ने उसे सुपर 30 के बारे में बताया। यह भी बताया कि टेस्ट देकर वह प्रवेश ले सकता है तो धनंजय फीस के 50 रुपए जमा करने में लग गया। तीन-चार दिन में दुकान से किसी तरह पैसा बचाकर वह बिना टिकट ही ट्रेन से पटना गया। मुझसे मिला और संस्थान का हिस्सा बन गया। दो वर्षों में उसने अपनी मेहनत और लगन से सबका दिल जीता। क्लास में हर सवाल हल करने में वह सबसे आगे रहता और अपने सहपाठियों की भी खूब मदद करता।


छोटी उम्र में इतना संघर्ष झेल चुके धनंजय की आंखें रिजल्ट आने के बाद भावनाओं को संभाल नहीं पा रही थीं। मैंने गौर से देखा तो उसने आज भी वही पैंट-शर्ट पहनी थी जो पहनकर वह पहली बार मुझसे मिलने आया था। पूछने पर उसने बताया कि उसके पास वही एक जोड़ी कपड़े हैं और बीते दो साल उसने इसी के साथ गुजारे हैं।निरक्षर माता-पिता के बेटे धनंजय ने आईआईटी प्रवेश परीक्षा में केवल कामयाबी हासिल नहीं की, बल्कि उसे इतनी अच्छी रैंक मिली कि आईआईटी खड़गपुर में दाखिला मिला। आज आपनी मां की प्रेरणा और अपनी मेहनत के बूते वह पढाई पूरी करके एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी कर रहा है। 

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