बटुकेश्वर दत्त ने ही भगत सिंह को दी थी हैट:बटुकेश्वर दत्त को इसका दुख था कि भगत सिंह की तरह उन्हें फांसी की सजा क्यों नहीं मिली

पटनाएक महीने पहलेलेखक: प्रणय प्रियंवद
बटुकेश्वर दत्त। (फाइल)

पटना को इस बात का गौरव है कि आजादी की लड़ाई के लिए भगत सिंह के साथ मिलकर जान जोखिम में डालने वाले बटुकेश्वर दत्त यही रहे। पटना के न्यू जक्कनपुर इलाके में उन्होंने लंबा समय बिताया। यहां उनका फ्लैट है। जब हम उनके फ्लैट पर पहुंचे, तब वहां ताला लगा था।

उनकी बेटी भारती बागची से फोन पर संपर्क करने से पता चला कि वे पुणे में हैं। जहां मंझले बेटे की शादी होनी है। बड़ा बेटा रूस में रहता है। बटुकेश्वर दत्त की एक ही संतान थी भारती बागची। भारती बागची के तीन बेटे भास्कर बागची, निलंजन बागजी और अविक बागची हुए। सबसे छोटे बेटे अविक बागची की मौत कोरोना के समय पटना के जक्कनपुर में हो गई थी।

व्यवस्था ऐसी की गई थी कि बटुकेश्वर दत्त पटना में ही रहे
जक्कनपुर के बीके दत्ता मेंशन में हमारी मुलाकात रविशंकर गांगुली से हुई। वे बटुकेश्वर दत्त परिवार के पारिवारिक मित्र हैं। उन्होंने बटुकेश्वर दत्त को देखा भी है। वे बताते हैं कि बटुकेश्वर दत्त जब पटना के बांकीपुर जेल से रिहा हुए तो वे पंजाब जाकर भगत सिंह के परिवार के साथ रहना चाहते थे। लेकिन तत्कालीन सरकार ने ऐसी व्यवस्था बनाई कि वे पटना में ही रहे। कहीं बाहर नहीं जाएं। उन्हें लोन दिया गया और उस पैसे से उन्होंने जमीन ली और घर बनाकर पटना के जक्कनपुर में रहने लगे। बहुत बाद में बेटी ने यहां अपार्टमेंट बनवाया। बाद में सरकार ने लोन माफ कर दिया।

भगत सिंह की हैट बहुत दिनों तक पटना में थी
रविशंकर गांगुली बताते हैं कि भगत सिंह की मां विद्यापति बराबर पटना आती थीं। बटुकेश्वर दत्त संविधान समिति के सदस्य बनना चाहते थे। वे भगत सिंह के विचारों को संविधान में जगह देना चाहते थे। बटुकेश्वर दत्त नहीं चाहते थे कि हिंदुस्तान का बंटवारा हो। भगत सिंह के सिर पर जो हैट दिखती है, वह बटुकेश्वर दत्त ने ही उन्हें दी थी। बहुत दिनों तक वह हैट पटना में बटुकेश्वर दत्त के आवास में थी। वर्द्धमान रेलवे स्टेशन को बटुकेश्वर दत्त के नाम से करने का प्रयास भाजपा सरकार के मंत्री नित्यानंद राय ने की, पर अब तक यह काम नहीं हो सका है।

बिहार विधान परिषद में बटुकेश्वर दत्त चार माह के लिए एमएलसी रहे थे।
बिहार विधान परिषद में बटुकेश्वर दत्त चार माह के लिए एमएलसी रहे थे।

भगत सिंह के साथ मिलकर असेंबली में बम फेंका था
हम उनके आवास बी.के दत्ता मेंशन से निकले तो विधान मंडल के बाहर उनकी मूर्ति के पास पहुंचे। यह मूर्ति यहां इसलिए लगाई गई कि उच्च सदन बिहार विधान परिषद में बटुकेश्वर दत्त चार माह के लिए एमएलसी रहे थे। 8 अप्रैल, 1929 को क्रांतिकारी भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंका था। दो विवादित बिल का विरोध करने के लिए बम फेंके गए थे। अंग्रेज सरकर दिल्ली की असेंबली में ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ और ‘ट्रेड डिस्प्यूट बिल’ जैसे दमनकारी कानूनों को पास कराकर लागू कराना चाहती थी। 'ट्रेड डिस्प्यूट बिल' पास किया जा चुका था, जिसमें मजदूरों द्वारा की जाने वाली हर तरह की हड़ताल पर पाबंदी लगा दी गई थी। लेकिन 'पब्लिक सेफ्टी बिल' पर अध्यक्ष विट्ठलभाई पटेल को अपना फैसला सुनाना था।

बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास की सजा हुई
इस बिल में सरकार को संदिग्धों पर बिना मुकदमा चलाए उन्हें हिरासत में लेने का अधिकार दिया जाना था। दोनों क्रांतिकारियों ने 'बहरों के कानों तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए' बम फेंका था। बम फेंकने का मकसद हिंसा फैलाना नहीं था। बम फेंकने के बाद दोनों ने इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए और गिरफ्तारी दी। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास की सजा हुई। 17 दिसंबर 1928 को लाहौर के पुलिस अधीक्षक सांडर्स हत्याकांड मुकदमा में भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव को फांसी हुई और बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास की सजा हुई। वे सलेम, हजारीबाग, बांकीपुर, मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, दिल्ली और लाहौर जेल में रहे। 8 सितंबर, 1938 को बांकीपुर, पटना जेल से बटुकेश्वर दत्त को रिहा किया गया। 1947 में देश आजाद होने के बाद इन्होंने अंजली दत्त से विवाह किया और पटना में रहने लगे।

कानपुर में भगत सिंह के साथ मिलकर बम बनाना सीखा
बटुकेश्वर दत्त का जन्म 18 नवम्बर 1910 को ग्राम-औरी, जिला - नानी बेदवान (बंगाल) में हुआ था। इनका बचपन अपने जन्म स्थान के अलावा बंगाल प्रांत के वर्धमान जिला में बीता। कानपुर के पी.पी.एन कॉलेज से वे स्नातक कर रहे थे। वहीं 1924 में भगत सिंह से उनकी मुलाकात हुई। इन्होंने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के लिए कानपुर में कार्य करना शुरू किया। बम बनाना भी उन्होंने वहीं सीखा।

भगत सिंह ने कहा था- मां तुम्हें जब मेरी याद आए तो तुम बटुकेश्वर दत्त को खोज लेना
बिहार विधान परिषद में कार्यरत भैरव लाल दास से हमने विधान मंडल के मुख्य गेट के पास स्थित बटुकेश्वर दत्त की मूर्ति के पास बात की। उन्होंने बटुकेश्वर दत्त पर किताब लिखी है। वे बताते हैं कि भगत सिंह ने जेल में मिलने पहुंची अपनी मां से कहा था- 'तुम्हें जब मेरी याद आए तो तुम बटुकेश्वर दत्त को खोज लेना।' भगत सिंह की मां विद्यावती देवी यह जीवन भर मानती रही कि भगत सिंह की आत्मा बटुकेश्वर दत्त में है। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी हुई जबकि बटुकेश्वर दत्त को काला पानी की सजा दी गई।

फांसी की सजा न मिलने से बटुकेश्वर दत्त काफी अपमानित महसूस कर रहे थे। इस पर भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त को एक पत्र लिखा। भगत सिंह ने पत्र में कहा कि -'वे दुनिया को यह दिखाएं कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए मर ही नहीं सकते। बल्कि जीवित रहकर जेलों की अंधेरी कोठरियों में हर तरह का अत्याचार भी सहन कर सकते हैं।’ भगत सिंह ने उन्हें समझाया कि मृत्यु सिर्फ सांसारिक तकलीफों से मुक्ति का कारण नहीं बननी चाहिए। काला पानी की सजा के तहत बटुकेश्वर दत्त को अंडमान की सेल्युलर जेल भेजा गया। वहां से 1937 में उन्हें बांकीपुर केन्द्रीय कारागार, पटना लाया गया। 1938 में दत्त की रिहाई पटना में तो हो गई लेकिन कालापानी की सजा के दौरान उन्हें गंभीर बीमारी टीबी हो गई थी। जेल से बाहर आने के बाद वे गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़ गए। उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। चार साल बाद 1945 में वे रिहा किए गए। पटना में उन्होंने एक बिस्कुट फैक्ट्री में काम तक किया।

विधान मंडल के बाहर बटुकेश्वर दत्त की मूर्ति लगी है।
विधान मंडल के बाहर बटुकेश्वर दत्त की मूर्ति लगी है।

पटना के कमिश्नर को बटुकेश्वर दत्त से माफी मांगनी पड़ी
बटुकेश्वर दत्त और पटना से जुड़ी कई कहानियां हैं। एक बार तो पटना में बसों के परमिट के लिए बटुकेश्वर दत्त ने भी आवेदन किया। परमिट के लिए जब पटना के कमिश्नर के सामने उनकी पेशी हुई तो कमिश्नर ने उनसे स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाण पत्र लाने को कहा। यह बात जब राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद तक पहुंची तो कमिश्नर को बटुकेश्वर दत्त से मांफी मांगनी पड़ी।

उनकी अंतिम इच्छा यह थी
बटुकेश्वर दत्त की स्थिति जब गंभीर हो गई तो उन्हें चमनलाल पटना आकर दिल्ली लेते गए। वहां उनका इलाज चला। वहां पता चला कि दत्त को कैंसर हो गया है। भगत सिंह की मां ने अपने सारे पैसे उनके इलाज के लिए भेज दिया। दत्त की तबियत दिल्ली में काफी नाजुक हो गई। पंजाब के मुख्यमंत्री रामकिशनजी ने उनसे पूछा कि हम आपको कुछ देना चाहते हैं, आपको जो मांगना हो मांग लीजिए। बटुकेश्वर दत्त की आंख में आंसू आ गए। उन्होंने कहा- मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस मेरी यही अंतिम इच्छा है कि मेरा दाह-संस्कार मेरे मित्र भगत सिंह की समाधि के बगल में किया जाए। इसके कुछ दिन बाद दत्त की यादाश्त चली गई।

20 जुलाई 1965 की वह रात बहुत काली थी। रात में एक बजकर 50 मिनट पर बटुकेश्वर दत्त ने दुनिया छोड़ दिया। दत्त की बेटी भारती बागची ने मुखाग्नि दी। हुसैनीवाला में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की समाधि के बगल में बटुकेश्वर दत्त की समाधि है। बटुकेश्वर दत्त ने तमाम जेलों में यातना भरी जिंदगी जीते हुए अपने मित्र भगत सिंह की बातों को जमीन पर उतारा कि आजादी के दीवाने 'क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए मर ही नहीं सकते बल्कि जीवित रहकर जेल की अंधेरी कोठरियों में हर तरह का अत्याचार भी सहन कर सकते हैं।'