आशा कर्मियों के ड्रेस का बजट अब 1500 रुपए:साल भर ड्रेस मेंटेन करने के लिए सरकार ने बढ़ाए 500, आशा वर्कर बोलीं- यह पर्याप्त नहीं

पटना9 महीने पहले
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महिला दिवस पर सरकार ने आशा कर्मियों के ड्रेस का बजट 500 रुपए बढ़ा दिया है। अब साल में एक बार 15 सौ रुपए दिए जाएंगे। अब तक उन्हें एक हजार रुपए ही ड्रेस के लिए मिलते थे। आशा कर्मियों का कहना है कि पहले एक हजार में भी नहीं होता था और अब 15 सौ रुपए भी पर्याप्त नहीं है। महंगाई के इस दौर में एक साल फील्ड वर्क में ड्रेस मेंटेन करना मुश्किल है।

अब तक ड्रेस मेंटेन करने के लिए सरकार देती थी सालाना 1000 रुपए

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर मंगलवार को स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने पटना के गुरुनानक भवन परिसर में राज्य के 114 महिला स्वास्थ्य कर्मियों (आशा कार्यकर्ता, ANM-GNM, महिला चिकित्सा पदाधिकारी) को सम्मानित किया। इस दौरान ही स्वास्थ्य मंत्री ने आशा कार्यकर्ताओं को ड्रेस खरीद में 500 रुपए अतिरिक्त राशि देने की घोषणा भी की। यह धनराशि आशा कर्मियों को अगले वित्तीय वर्ष से दी जाएगी। अब साल में परिधान की खरीद के लिए एक हजार सालाना मिलने वाली वित्तीय अनुदान में 500 रुपए की बढ़ोतरी कर उसे राज्य कोष से 15 सौ रुपए कर दिया गया है।

90 हजार आशा कर्मियों की बड़ी समस्या

राज्य की लगभग 90 हजार आशा कर्मियों की यही समस्या है कि फील्ड वर्क में वह एक साल तक कैसे ड्रेस को मेंटेन रख सकती हैं। ड्यूटी ऐसी है कि एक ही दिन में ड्रेस पूरी तरह से गंदा हो जाता है। पटना की आशा सुनीता बताती हैं कि ड्रेस में सरकार ने 500 रुपए बढ़ाया खुशी की बात है, लेकिन इतना भी पर्याप्त नहीं है। आशा को काफी संघर्ष करना पड़ता है। आशा कर्मी स्वास्थ्य विभाग का चेहरा होती हैं, इसलिए सरकार को थोड़ा और विचार करना चाहिए। हर मोर्चे पर आशा जुटी रहती हैं, लेकिन सरकार का ध्यान नहीं होता है। पटना की ही गीता देवी का कहना है कि सरकार को आशा के कार्यों को देखते हुए बजट बढाना चाहिए, जिससे महंगाई के दौर में ड्रेस से लेकर परिवार भी अच्छे से चल सकें। बच्चों की शिक्षा अच्छी हो जाए और घर परिवार की आशा भी निराशा में नहीं बदले।

वैक्सीनेशन को आशा ने दी नई दिशा

स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि राज्य में लगभग 90 हजार आशा कार्यकर्ता हैं। स्वास्थ्य विभाग में सेवा दे रही महिला कर्मियों के साहस व हौसले की प्रशंसा भी स्वास्थ्य विभाग करता है। स्वास्थ्य मंत्री ने तो यहां तक कहा कि कोविड काल में आशा कर्मियों ने टीकाकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है। केंद्र व राज्य सरकार की बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान ने नारी सशक्तिकरण की दिशा में नया अध्याय जोड़ा है। आज आलम यह है कि पुरुष व महिलाओं के बीच की लैंगिक असमानता में महिलाओं की संख्या बढ़ी है। आधी आबादी को मजबूती देने में भी आशा का बड़ा योगदान रहा है। आधी आबादी कभी घर के अंदर रहती थीं, लेकिन आशा इतिहास रच रही हैं। आशा का कहना है कि वह अपने अधिकारों को लेकर हमेशा लड़ाई लड़ रही हैं, सरकार उनकी मांग सुन ले यही बहुत है।

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