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पूजा - पाठ:आस्था में डूबे श्रद्धालु, कलश स्थापित कर पाठ करने वालों की मन्नतें हो जाती हैं पूरी

कोईलवर6 दिन पहले
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कोईलवर में मूर्ति को अंतिम रूप देते कलाकार।
  • 1958 से लगातार होती है कलश स्थापना

कोरोना काल को लेकर शारदीय नवरात्र में पूजा पाठ, कलश स्थापना के कई नियम बदल दिए गये। इस बार नगर पंचायत कोईलवर के सबसे पुराने आज़ाद कला मन्दिर पर मूर्ति स्थापना का निर्णय अंत में लिया गया। जिसके बाद मंदिर परिसर में केवल पांच श्रद्धालुओं को कलश स्थापना के साथ पूजा करने की अनुमति संस्था द्वारा दी गयी। जो सोशल डिस्टेंसिंग के साथ पूजा अर्चना शुरू किये। हालांकि जिला प्रशासन द्वारा दिये गए निर्देशों के बाद प्रसाद वितरण पर रोक है। आस्था का प्रतिक नगर के वार्ड 3 में आज़ाद कला मंदिर की स्थापना 1958 में हुर्इ थी। जहाँ गांव का सबसे पुराना देवी मंदिर है। इस मंदिर से गांव के लोगो की आस्था जुड़ी हुई है। 62 सालाें में मंदिर ने कई उतार चढ़ाव देखे। वृद्ध लोग बताते हैं शुरुआत के दिनों में टेंट लगा देवी मंदिर में पूजा अर्चना शुरू हुई थी। 1975 की भयावह बाढ़ ने भी देवी मंदिर में कोई क्षति नही हुयी। 62 वर्षाें से लगातार मंदिर प्रांगण में माँ दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर कलश स्थापना कर पूजा पाठ शुरू हुआ। जो अब तक निरन्तर जारी है। जहां नवरात्र में काफी चहल पहल रहती है। मंदिर प्रांगण में पूर्व में बलि प्रथा की परम्परा थी। लेकिन समय के बदलते परिवेश में बलि प्रथा को बन्द कर दिया गया। कोरोना को लेकर नवरात्र में मंदिरों के आस पास लगने वाले जलेबी, चाट, समोसे की दुकान लगाने पर रोक है। जिससे सोशल डिस्टेंस का पालन हो सके।

शारदीय नवरात्र में कलश स्थापना की लगी रहती है होड़

नवरात्र में मंदिर प्रांगण में कलश स्थापना कर पाठ करने वाले भक्तो की हर मन्नते पूरी होती है। मंदिर स्थापना के शुरुआत में एक भक्त माँ की आराधना कर दुर्गा सप्तशती की कथा सुनते थे। लेकिन हाल के दिनों में मंदिर परिसर में ग्यारह श्रद्धालु दुर्गा सप्तशती का पाठ कर आराधना करते है। ऐसी धारणा है कि मंदिर प्रांगण में दुर्गा सप्तशती का पाठ करने के बाद उस भक्त को किसी सरकारी या निजी संस्था में अच्छे ओहदा मिल जाता है। नौकरी मिलते ही भक्त अपनी पहली तनख्वाह से दुर्गा माँ की प्रतिमा का साजो सामान व प्रसाद की जिम्मेवारी लेते है। यह परंपरा 62 वर्षाें से चला आ रहा है। इधर मंदिर परिसर में ही देवी मंदिर है। जहाँ संध्या के समय दीप जलाने के लिये सैकडाें महिला व युवती पहुंचती है। हालांकि कोरोना के मद्देनजर मन्दिर प्रबंधन द्वारा कई नियम कानून बनाये गए हैं। जिससे पांच को ही पूजा करने की अनुमति दी गयी है।

शेषनाग पर सवार है मां दुर्गा
कोरोना काल को लेकर प्रशासन द्वारा जारी निर्देश के अनुसार चार फीट की प्रतिमा बनी है। जिसमें माँ दुर्गा शेषनाग पर सवार हैं। मूर्तिकार रामायण बताते हैं कि छोटी मूर्ति बनाने के लिए माता की प्रतिमा शेषनाग पर हैं। वहीं माँ सरस्वती, माँ लक्ष्मी, गणेश भगवान, कार्तिकेय भगवान की भी मूर्तियां छोटी बनायी गई है। मूर्तियों को आकर्षक बनाया जा रहा है। जिसमें उनके साथ जितेंद्र व राहुल मूर्ति का अंतिम रूप दे रहें हैं।

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