विपरीत परिस्थितियों में जीत की कहानी / विकलांगता भी नहीं बन सकी बाधा, आईआईटी में एडमिशन पाया, रेलवे में बना अधिकारी

Disability could not be a hindrance too, got admission in IIT, made officer in railway
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Disability could not be a hindrance too, got admission in IIT, made officer in railway

  • कोरोना संकट के बीच विपरीत परिस्थितियों में जीत की कहानी सुपर-30 के आनंद कुमार के शब्दों में

दैनिक भास्कर

May 21, 2020, 06:07 PM IST

यह कहानी है उत्तर प्रदेश के एक ऐसे सफल आईआईटीयन की, जिसे उसके गांव वालों ने भीख मांगने की सलाह दी थी। वक्त के साथ इस काबिल छात्र ने सबको पीछे छोड़ते हुए आईआईटी में सफलता प्राप्त कर मिसाल कायम की।

उत्तर प्रदेश के बिजनौर के पास का गांव है झीरन। मनीराम सिंह वहीं का है। बड़े संयुक्त परिवार में दो बीघा से कम खेती। पिता आशाराम सिंह के लिए मजदूरी ही एकमात्र सहारा था परिवार की गाड़ी खींचने के लिए। मनी एक साल का हुआ था। घर में खुशियों का माहौल था। अचानक उसे तेज बुखार आया। शाम ढलने तक वह पोलियो की चपेट में आ गया।

एक पैर पूरी तरह से खराब हो चुका था। घर में तो जैसे मातम पसर गया। मनीराम बड़ा हुआ तो पड़ोस के बच्चों को स्कूल जाता देखकर ललचाता। एक दिन पिता से पढ़ने की इच्छा जाहिर कर दी। उनकी आंखों में आंसू छलक आए। पिता के कंधे पर सवार होकर मासूम मनी स्कूल जाने लगा। वक्त गुजरता गया। मनी ने खूब मन लगाया। पास होता गया।

उस दौर में पिता अक्सर समझाते, ‘बेटा दो बदनसीबियां तेरे हिस्से में हैं। एक तो घोर गरीबी, दूसरी तेरा अपाहिज होना। इनसे संघर्ष करके तुझे कुछ करना है।’ मां कुसुमदेवी ने उस मुश्किल दौर में आस-पड़ोस से उधार लेकर बच्चों का पेट भरा। हाई स्कूल की दहलीज पर आने तक मनी लाठी के सहारे चलने लगा। स्कूल गांव से दूर था। गांव वालों को जब पता चला कि मनी पढ़ने के लिए आगे जाना चाहता है तो सबने मजाक उड़ाया। पास के गांव के हम उम्र विकलांग बालक का उदाहरण देकर उसे सलाह दी कि पैर खराब है तो भीख मांगना सबसे आसान है। ट्रेनों और बसों में जाओ। कुछ कमा ही लोगे। मनी के दिल को गहरी चोट लगी। सरकारी स्कूल से दसवीं पास करने के बाद जिंदगी में पहली दफा उसने आईआईटी का नाम सुना। उस जैसे विद्यार्थी के लिए यह लक्ष्य मजाक नहीं था।

कहीं से सुपर 30 के बारे में सुना और जिंदगी के इस अहम मोड़ पर वह टीम में शामिल हुआ। पढ़ाई का पहला दिन था। बच्चे क्लासरूम साफ कर रहे थे। मनी दरवाजे पर लाठी लिए खड़ा था। अचानक उसने भी झाड़ू उठाई और लगा सफाई करने। मेरी माताजी ने उसे रोका। मनी बोला, ‘मुझे अपना काम करने दीजिए। मैं किसी से खुद को कम नहीं मानता।’

2014 में जब आईआईटी की प्रवेश परीक्षा के नतीजे आए तो मनी अपने कैटेगरी में ऑल इंडिया रैंक 2 पर था। उसकी आंखों से आंसू गिर रहे थे। उसने आईआईटी मुंबई में दाखिला लिया। कुछ दिनों बाद उसका फोन आया। उसने बताया कि यूपीएससी द्वारा आयोजित रेलवे की स्पेशल क्लास एप्रेंटिस में परीक्षा में उसका चयन हो गया है। उसने आईआईटी में पढ़ाई जारी रखने की बजाए रेलवे की सेवा में जाना तय किया है। आज मनीराम सिंह असम में रेलवे में बतौर अधिकारी काम कर रहा है।

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