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सफलता के सूत्र:शिक्षा ही ऐसा एकमात्र माध्यम है, जो गरीबी से बाहर निकाल सकता है

एक महीने पहले
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  • कोरोना संकट के बीच विपरीत परिस्थितियों में सफलता के सूत्र सुपर-30 के आनंद कुमार के शब्दों में

लॉक-डाउन के कुछ दिनों पहले अंकित रंजन का फोन आया। वह बहुत खुश था, मैंने सोचा कि हर बार की तरह हाल-चाल लेने के लिए फोन किया होगा। लेकिन अंकित ने बताया कि वह वर्तमान में एक बड़ी कंपनी में बतौर इंजीनियर नौकरी करता है, परन्तु उसकी सेवा भावना को देखते हुए कंपनी ने सीएसआर के तहत उसे निर्धन बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी दी है, उसने बताया कि समाज को कुछ वापस करके उसे बहुत अच्छा लग रहा है। वह चाहता था कि जिस तरह से सुपर 30 में पढ़कर खुद इंजीनियर बना है, समाज के जरूरतमंदों को भी शिक्षित करके उन्हें काबिल बनाए। अब वह अच्छी तरह से समझता है कि शिक्षा ही एकमात्र माध्यम है, जिसकी सहायता से गरीबी से बाहर निकला जा सकता है। उसने मुझे उसने अपने इस कार्यक्रम में बतौर अतिथि शिक्षक आमंत्रित भी किया। 

अंकित से बातें करते हुए मैं धीरे-धीरे कई साल पीछे चला गया। मुझे एक बार फिर से याद आने लगा अंकित के पिताजी अवधेश कुमार सिंह का चेहरा। वे बड़े विनम्र भाव से मेरे सामने खड़े थे और बोल रहे थे कि वे टेलीफोन डिपार्टमेंट में एक मामूली लाइन मैन हैं। उनकी आमदनी बहुत ही सीमित थी, लेकिन वे अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं। उन्होंने अपने बेटे अंकित को सुपर 30 में रख लेने का मुझसे आग्रह किया। मैंने अंकित के टैलेंट और उसके पिता के व्यवहार से प्रभावित होकर उसे अपने पास रख लिया। अंकित बहुत ही मेहनती और टैलेंटेड था। सुपर 30 में कई बच्चों की समस्याओं का समाधान भी वह कर देता था।

मुझे याद है कि रीजिनल मैथमेटिकल ओलिंपियाड की परीक्षा में उसने अच्छा परफॉर्मेंस किया था। उसके पिताजी पटना में ही एक छोटे से किराए के मकान में रहते थे, इसलिए जब भी शाम को मौका मिलता, मुझसे चुपके से मिलने आ जाया करते थे। यह बात वे अंकित को नहीं बताना चाहते थे और कई बार सुपर 30 के क्लास रूम में से छिपकर अपने बेटे को पढ़ते देखकर बहुत खुश हुआ करते थे। एक बार जब अवधेश जी चुपके से मुझसे मिलने आए, तब उन्होंने कहा कि सर आज से समझ ले कि अंकित आपका ही बेटा है। अब वह आपकी ही जिम्मेदारी है। मैंने उस दिन तय कर लिया कि चलो आज से अंकित मेरा ही बेटा है। सच में उसके बाद मैं अंकित को अपने बेटे जैसा समझने लगा, लेकिन अंकित के पिता की वो मुलाकात, आखिरी मुलाकात सिद्ध हुई। इंटर की परीक्षा शुरू होने ही वाली थी कि अचानक पता चला कि अंकित के पिता का एक्सीडेंट हो गया है और वे एक अस्पताल में भर्ती हैं। 

अंकित को संभालना काफी मुश्किल हो रहा था। चार दिनों के बाद उसके पिताजी इस दुनिया को छोड़ कर चल बसे। अंकित पर दुखों का पहाड़ टूट गया था। अंकित के परिवार को पटना छोड़ कर गांव जाना पड़ा अंकित के इस मुश्किल वक्त में, तब जितना भी हो सका मैंने अंकित को पिता और गुरु दोनों का प्रेम देने का प्रयास किया। तमाम मुश्किलों के बावजूद अंकित टूटा नहीं, हारा नहीं। पूरी लगन के साथ फिर से मेहनत शुरू की और परीक्षा देने के लिए कमर कस ली। आई. आई. टी. का रिजल्ट आ गया था और अंकित खुश था। ठीक चार साल बाद एक दिन अंकित ने बताया कि उसकी नौकरी लग गई है। तब मुझे लगा कि जैसे मेरे ही अपने बेटे को सफलता मिली हो। उस दिन मुझे ऐसा लग रहा था कि अंकित के पिताजी मेरे सामने मुस्कुराते हुए खड़े हैं मेरे आगे बढ़ाते हुए जैसे कह रहें हों- सर आज मैं बहुत खुश हूं , क्योंकि आज मेरे नहीं बल्कि आपके बेटे अंकित ने मेरे सपने को पूरा कर दिया है।

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