'जवाहिर रजवार एक विस्मृत स्वतंत्रता सेनानी' पर श्रीकांत का व्याख्यान:1857 के नायक जवाहिर रजवार को बदनाम करने के लिए अंग्रेजों ने घोषित किया था डकैत

पटना6 महीने पहले
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'जवाहिर रजवार एक विस्मृत स्वतंत्रता सेनानी' पर व्याख्यान में शामिल लोग। - Dainik Bhaskar
'जवाहिर रजवार एक विस्मृत स्वतंत्रता सेनानी' पर व्याख्यान में शामिल लोग।

आजादी का अमृत महोत्सव और महापरिनिर्वाण दिवस पर अनुग्रह नारायण सिंह समाज अध्ययन संस्थान, पटना में एक व्याख्यान का आयोजन किया गया। इसके वक्ता जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनितिक शोध संस्थान पटना के निदेशक श्रीकांत थे। उन्होंने 'जवाहिर रजवार, एक विस्मृत स्वतंत्रता सेनानी' पर अपने विचार रखे। एक घंटे के व्याख्यान को लोगों ने मनोयोग पूर्व सुना।

श्रीकांत ने विस्तार से जवाहिर रजवार के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि जवाहिर रजवार 1857 के नायक थे। उन्हें इतिहास के पन्नों में विशेष स्थान प्राप्त नहीं हुआ। देश के स्वतंत्रता संग्राम 1857 में बिहार के नवादा जिले के निवासी जवाहिर रजवार, एतवा रजवार और कारू रजवार की उल्लेखनीय भूमिका थी। नवादा और आसपास के इलाकों में होनेवाले विद्रोह की घटनाओं में जवाहिर, एतवा और कारू ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। रजवार नवादा जिले के आसपास जिलों में लगातार 10 साल तक लड़ते थे। सरकारी कचहरी, बंगले, जमींदार और उसके कारिंदे की संपत्ति विद्रोहियों के निशाने पर थी। विद्रोहियों को जब मौका मिलता था, घटना को अंजाम देने से नहीं चूकते थे।

कई जमींदारों ने विद्रोहियों को समर्थन करना शुरू कर दिया था। तब अंग्रेज अधिकारियों ने विद्रोह पर काबू पाने के लिए विद्रोहियों को चोर और डकैत जैसा गलत नाम देने लगे। ताकि विद्रोहियों से लगाव की बजाय लोगों में नफरत पैदा हो सके। दीगर है कि जवाहिर, एतवा और कारू रजवार को अंग्रेजों और भारतीय जमींदारों द्वारा बदमाश और डकैत कहा गया। अंग्रेजों और भारतीय जमींदारों द्वारा रजवारों का शिकार किया गया। 27 सितंबर, 1857 को जवाहिर करीब 300 आदमियों के साथ विद्रोह की रणनीति बना रहे थे। तभी अंग्रेज सैनिकों ने गोलियां बरसानी शुरू कर दी थीं। बाद में जवाहिर की मौत हो गई। श्रीकांत ने यह भी कहा कि Unsung Hero of the National Movement of Bihar पर अभी काफी काम करने की जरूरत है।

आयोजन में वरिष्ठ नेता व पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी, प्रोफेसर रामबली सिंह, प्रोफेसर संजय कुमार, वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा, मंजीत आनंद, उमेश कुमार सिंह और पटना के समाजसेवी, शोधार्थी, इतिहासकार मौजूद थे। अनुग्रह नारायण सिंह समाज अध्ययन संस्थान के कुलसचिव प्रोफेसर नीलरतन द्वारा सहभागियों का स्वागत किया गया। डॉ. विद्यार्थी विकास ने संचालन किया।

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