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परिवार नियोजन की जिम्मेवारी महिलाओं पर:बिहार में महज 0.1% पुरुषों ने नसंबदी कराई, जबकि महिलाओं की संख्या 38%; बेतुका तर्क यह कि पुरुष कराएंगे तो कमजोर हो जाएंगे

पटना3 महीने पहलेलेखक: अजय कुमार सिंह
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चिकित्सकों की राय में पुरूष को तो नसबंदी के नाम से सांप सूंघ जाता है-सिबॉलिक इमेज - Dainik Bhaskar
चिकित्सकों की राय में पुरूष को तो नसबंदी के नाम से सांप सूंघ जाता है-सिबॉलिक इमेज

बिहार में जिस तरह से शुरू में लोग कोरोना का टीका लेने, रक्तदान करने या फिर अंगदान करने में हिचकिचाते हैं। उससे कहीं ज्यादा लोग नसबंदी कराना नहीं चाहते हैं। परिवार नियोजन कराने की जिम्मेवारी महिलाओं पर ही थोपी जाती है। यानी यह काम भी महिलाओं को करनी है। तर्क है कि पुरुष कराएंगे तो शायद वे कमजोर हो जाएंगे। पर विशेषज्ञों के मुताबिक इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।

यदि महिला इसके प्रति जागरूक और शिक्षित है तो वह खुद ही इसके लिए आगे आती हैं। स्त्री रोग विशेषज्ञों की माने घर वाले के मर्जी बगैर महिला बंध्याकरण भी नहीं कराती है। अधिकांश ग्रामीण महिलाओं का अधिकार इसपर नहीं चलता है। कहा जाता है पता नहीं कब क्या हो जाय? प्रसव के दौरान सरकारी अस्पताल में बंध्याकरण या फिर कॉपर-टी की सुविधा है।

पुरुष नसबंदी के नाम से ही पीछे हटते हैं

चिकित्सकों की राय में पुरूष को तो नसबंदी के नाम से सांप सूंघ जाता है। यहीं वजह है कि साल में चार बार परिवार नियोजन पखवाड़े का आयोजन के बावजूद राज्य और राज्य के राजधानी पटना में पुरूष नसबंदी का आंकड़ा 0.1% ही है। हालांकि राज्य में महिला बंध्याकरण 20.7% से बढ़कर 38.4% हो गई है। जबकि पटना में यह आंकड़ा 32.2% से घटकर 31.4% हो गई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के आंकड़ों के अनुसार बीते पांच वर्षों में बिहार में कुल प्रजनन दर 3.4 से घटकर 3 हो गई है।

नियोजन साधन के प्रयोग में मुजफ्फरपुर अव्वल

परिवार नियोजन के साधनों के इस्तेमाल में राज्य में दोगुना से अधिक की वृद्धि दर्ज हुई है। बिहार में परिवार नियोजन के किसी साधन के इस्तेमाल में मुजफ्फरपुर ने सर्वाधिक बढ़ोतरी दर्ज की है। वहीं दूसरे स्थान पर 50.7 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ समस्तीपुर, तीसरे पर 48.3 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ गोपालगंज, चौथे पर 46.9 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ शिवहर है।

अनमेट नीड घटाने में शेखपुरा राज्य में प्रथम
कभी-कभी लोग परिवार नियोजन के साधन अपनाना चाहते हैं लेकिन उन्हें सही समय पर साधन उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। ऐसी स्थिति को टोटल अनमेट नीड कहा जाता है। वर्ष 2015-16 में जहां राज्य की टोटल अनमेट नीड 21.2 फीसदी थी, जो अब घटकर 13.6 फीसदी हो गई है।