भीषण महामारी में भी ये लापरवाही:कोरोना के पीक में हम सांसों के लिए भटकते रहे, कई ने दम तोड़ दिया,207 वेंटिलेटर की पैकिंग ही नहीं खुली

पटना2 वर्ष पहलेलेखक: गिरिजेश कुमार
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207 में से सिर्फ दो दर्जन वेंटिलेटर ही लगे निजी अस्पतालों में - Dainik Bhaskar
207 में से सिर्फ दो दर्जन वेंटिलेटर ही लगे निजी अस्पतालों में
  • अब निजी अस्पतालों को देंगे सरकारी में बेकार पड़े वेंटिलेटर

सरकारी हों या निजी अस्पतालों से हजारों ऐसे मरीज इसलिए लौट गए कि वहां आईसीयू बेड खाली नहीं थे। वेंटिलेटर नहीं था। अस्पतालों के गेट से जो लौटे उनमें कितने बचे और कितने गुजर गए, हम नहीं जानते। कोरोना की दूसरी लहर को लेकर जारी अलर्ट के बाद भी स्वास्थ्य विभाग वेंटिलेटर चलाने वालों की व्यवस्था नहीं कर पाया। राज्य के 36 जिलों में 207 वेंटिलेटरों में से अधिकांश की पैकिंग तक नहीं खुली लेकिन सिस्टम की पोल खुल गई। परिणम हुआ कि पटना से लेकर अन्य शहरों में वेंट बेड की वेटिंग में मरीजों की जान जाती रही। स्वास्थ्य विभाग ने इन वेंटिलेटरों को 2 मई को निजी अस्पतालों में लगाने की अनुमति दी।

16 दिन बीत गए। अबतक दो दर्जन वेंटिलेटर ही निजी अस्पतालों में इंस्टॉल हो पाए हैं। सरकारी अस्पतालों में वेंटिलेटर इसलिए इंस्टॉल नहीं हो पाए क्योंकि इन्हें चलाने के लिए 140 एनेस्थीसिस्ट चाहिए, हैं सिर्फ 77 ही। पीएम केयर फंड से आए थे वेंटिलेटर पीएम केयर फंड के तहत मार्च 2020 में 60,000 वेंटिलेटर खरीदे गए थे। इनमें 17000 राज्यों को दिए गए।

जुलाई से सितंबर माह के बीच आए वेंटिलेटरों में यह 207 वेंटिलेटर भी शामिल हैं, जो राज्य के 36 जिलों में संबंधित सिविल सर्जन के अधीन पड़े है। सरकार ने इसी माह इन्हें निजी अस्पतालों में लगाने का निर्णय लिया। राज्य स्वास्थ्य समिति ने डीएम और सिविल सर्जन को पत्र जारी 24 घंटे में रिपोर्ट भी मांगी। 16 दिन बाद भी ज्यादातर वेंटिलेटर जिलों में पड़े हैं।

वेंटिलेटर : यह हुआ था निर्णय

राज्य स्वास्थ्य समिति ने 30 अप्रैल को निजी अस्पतालों को वेंटिलेटर देने का फैसला इसलिए लिया कि सरकारी अस्पतालों में इन्हें चलाने के लिए एनेस्थीसिस्ट व टेक्निशियन नहीं हैं। और जो हैं वे कोविड मरीजों के इलाज में लगे हैं। तय तो यह भी हुआ था कि अगर किसी जिले में वेंटिलेटर की संख्या से ज्यादा आवेदन प्राप्त होते हैं तो उन्हें दूसरे जिले से वेंटिलेटर आवंटित किया जाएगा।

निजी अस्पतालों के तय रेट

राज्य स्वास्थ्य समिति ने कहा था कि जिस अस्पताल को वेंटिलेटर आवंटित होगा, उन्हें मरीजों से स्वास्थ्य विभाग द्वारा निर्धारित अधिकतम दर से 2 हजार रुपए कम राशि लेनी होगी।

वेंटिलेटर चलाने वाले डाॅक्टर ही नहीं मिल रहे तो क्या करें,भर्ती के लिए हमने तीन बार कोशिश की

स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने कहा कि लोगों की सुविधा के लिए निजी अस्पतालों को सरकारी वेंटिलेटर देने का निर्णय लिया गया है। पटना समेत कई जिलों में वेंटिलेटर निजी अस्पतालों को दिए गए हैं। हमें यह समझना पड़ेगा कि वेंटिलेटर सिर्फ एक मशीन नहीं है जिसे बेड से जोड़ देने के बाद वह वेंटिलेटर बेड हो जाएगा। बेड के हिसाब से एनेस्थीसिस्ट की जरूरत होती है।

हमारे पास एनेस्थीसिस्ट नहीं हैं, इसलिए वेंटिलेटर रहते हुए भी उसे इंस्टॉला कर पाना संभव नहीं हो पाया। कई जगहों पर ये खबरें भी चलीं कि टेक्निशियन नहीं हैं इसलिए वेंटिलेटर का उपयोग नहीं हो रहा है, जबकि सच यह है कि टेक्निशियन वेंटिलेटर ऑपरेट नहीं करता है। वह सिर्फ सहयोग करता है। मुख्य काम एनेस्थीसिस्ट का है।

इसीलिए हमने यह निर्णय लिया था कि निजी अस्पतालों में जहां मैनपावर है और वेंटिलेटर ऑपरेट करने की व्यवस्था है उन्हें वेंटिलेटर दिए जाएंगे। एक साल में तीन बार हमने एनेस्थीसिस्ट की भर्ती की कोशिश की लेकिन हमें 140 की जगह सिर्फ 77 लोग मिले जो काम कर रहे हैं। हमने यह घोषणा भी कि 1.5 लाख रुपए देंगे लेकिन इस विशेषज्ञता वाले लोग ही कम हैं।

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