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हेल्थ इंश्योरेंस पाॅलिसी काम न आई:बिहार में कोराेना की दूसरी लहर में सिर्फ 0.41% लोगों को ही मिला मेडिक्लेम, हजारों लोगों ने घर पर कराया इलाज तो नहीं मिला लाभ; 4 कंपनियों के आंकड़ों से जानिए

पटना2 महीने पहले
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सिबॉलिक इमेज। - Dainik Bhaskar
सिबॉलिक इमेज।

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान हेल्थ इंश्योरेंस भी लोगों के काम नहीं आ सका। बिहार में सक्रिय चार बड़ी इंश्योरेंस कंपनियों (नेशनल इंश्योरेंस, यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस, मैक्स बूपा, केयर हेल्थ इंश्योरेंस) के आंकड़े बताते हैं कि संक्रमण के पीक समय अप्रैल व मई के दौरान पॉलिसी धारकों में सिर्फ 0.41% को ही मेडिक्लेम का लाभ मिल पाया। जबकि संक्रमित होने वालों की संख्या उससे कहीं ज्यादा थी।

इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि हजारों बीमार लोगों को जरूरत के समय अस्पतालों में बेड नहीं मिल सका। ऐसे में लोगों ने डॉक्टरों से सलाह लेते हुए घर पर ही इलाज करवाया। इस दौरान दवा, जांच व ऑक्सीजन पर हजारों रु. खर्च हुए। पर पॉलिसी होने के बावजूद क्लेम नहीं कर सके क्योंकि, किसी अस्पताल का बिल नहीं था।

बड़ी संख्या में मरीजों का इलाज सरकारी अस्पतालों में, इसलिए भी कम क्लेम

नेशनल इंश्योरेंस कंपनी के असिस्टेंट मैनेजर(हेल्थ) डॉ. रुपेश प्रसाद ने बताया कि कोरोना संक्रमित लोगों की एक बड़ी संख्या का इलाज सरकारी कोविड डेडिकेटेड अस्पतालों में कराया गया। मेडिक्लेम करने वालों की संख्या कम होने की एक वजह हो सकती है। नन नेटवर्क अस्पतालों में इलाज करने वाले ज्यादातर लोगों ने भी रीइम्बस्मेंट के लिए क्लेम नहीं किया।

कैसे कर सकते हैं मेडिक्लेम

हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी दो तरह की होती है। पहली, कैशलेस, जिसके तहत नेटवर्क हॉस्पिटल में इलाज के खर्च इंश्योरेंस कंपनी सीधे अस्पताल को देती है। दूसरा, रीइम्बर्समेंट, जिसमें मरीज पसंद के अस्पतालों में इलाज के बाद खर्च का क्लेम कर सकता है। इसके लिए पॉलिसी की कॉपी, आइडेंटिटी प्रूफ, डिस्चार्ज समरी, दवाओं का बिल और पेमेंट रसीद, जांच रिपोर्ट, तथा बैंक खाते का डिटेल देना होता है। कंपनी छानबीन के बाद लाभार्थी के खाते में पैसे भेज देती है।

5% अधिक राशि में डोमिसिलरी लाभ

कोरोनाकाल में आई परेशानियों को ध्यान में रखते हुए इंश्योरेंस कंपनियों ने पिछले वर्ष मेडिक्लेम पॉलिसी में डोमिसिलरी हॉस्पिटलाइजेशन के प्रावधान को जोड़ा था, जिसके लिए पॉलिसी धारक को करीब 5% अधिक प्रीमियम का भुगतान करना होता है। इस प्रावधान के तहत लोग घर पर हुए इलाज का खर्च क्लेम कर सकते हैं। इसके लिए दवाओं का बिल और पेमेंट रसीद, जांच रिपोर्ट, तथा अपने बैंक खाते का डिटेल देना होता है।

केस स्टडी: अस्पतालों में जगह नहीं थी, घर पर इलाज,क्लेम नहीं मिला

  1. बेउर की सीमा कुमारी 24 अप्रैल को संक्रमित हुई थीं। उनका पूरे परिवार के साथ हेल्थ इंश्योरेंस है। संक्रमित होने के बाद अस्पतालों की स्थिति ठीक नहीं होने से उन्होंने घर पर ही इलाज कराना बेहतर समझा। जांच और दवा पर करीब 9 हजार रुपए खर्च हुए। पर क्लेम नहीं कर सकीं।
  2. कदमकुआं के मनोज कुमार के पास पूरे परिवार की पॉलिसी है। मई में वह संक्रमित हुए। अस्पताल में भर्ती होने की बजाय घर पर इलाज कराया। दवा और जांच पर करीब 10 हजार खर्च हुए। पर अस्पताल में भर्ती नहीं होने की वजह से वह क्लेम नहीं कर पा रहे हैं।
  3. दानापुर थानापर के गणेश कुमार अप्रैल में पूरे परिवार के साथ संक्रमित हो गए। कई अस्पातल के चक्कर लगाने के बाद भी जगह नहीं मिली तो डॉक्टर की सलाह पर घर पर ही इलाज कराने लगे। 15 दिनों में दवा और ऑक्सीजन मिलाकर करीब 15 हजार रुपए खर्च आए। मेडिक्लेम पॉलिसी होने के बाद भी खर्च का क्लेम नहीं कर सका।
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