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साहित्य सम्मेलन:जगतबंधु का अनुशासन से भरा जीवन स्वयं में ही है एक ग्रंथ, सीख सकते हैं जीवन मूल्य

पटना8 दिन पहले
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अपने जीवन को किस प्रकार मूल्यवान और गुणवत्तापूर्ण बनाया जा सकता है, इसके जीवंत उदाहरण और प्रेरणा-पुरुष थे साहित्यसेवी जगत नारायण प्रसाद ‛जगतबंधु’। उनका अनुशासित और कल्याणकारी जीवन स्वयं में हीं एक ऐसा ग्रंथ रहा, जिसका अध्ययन कर कोई भी व्यक्ति अपने जीवन को मूल्यवान और सार्थक बना सकता है। यह बातें बुधवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित जयंती समारोह में सम्मेलन अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ ने कही। पर्यावरण वैज्ञानिक साहित्यकार डॉ. मेहता नगेंद्र सिंह का भी अभिनंदन किया गया।

इस अवसर पर कवि सम्मेलन का भी आयोजन हुआ, जिसमें कवियों और कवयित्रियों ने दिल को छूने वाली पंक्तियों से सम्मेलन सभागार को स्पंदित कर दिया। वरिष्ठ कवि मृत्युंजय मिश्र ने अपनी गज़ल को स्वर देते हुए कहा कि बहुत संभल के चले हम जरा जो पी के चले, मिली जो जिंदगी जीने को हम वो जी के चले..., डॉ. शंकर प्रसाद का कहना था कि करवट करवट कांटे हैं, नींद भी हमसे भागे हैं..., अन्य कवियों ने भी काव्य पाठ किया।

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