ओमिक्रॉन का पता लगाने के लिए बजट नहीं:जिनोम सिक्वेंसिंग जांच में 15 लाख का आता है खर्च, एक बार में 96 सैंपल की जांच

पटनाएक महीने पहलेलेखक: मनीष मिश्रा
जीनोम सिक्वेंसिंग के लिए IGIMS में लगाई गई मशीन।

दुनिया को दहशत में डालने वाले कोरोना के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन को डिटेक्ट करने के लिए बिहार में बजट ही नहीं है। सरकार ने इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) को जिनोम सिक्वेंसिंग का सेंटर तो बना दिया, लेकिन अब बजट का टोटा है। जिनोम सिक्वेंसिंग के लिए सैंपल की लाइन लगते ही IGIMS ने बिहार सरकार से जांच के लिए बजट की डिमांड कर दी है। अब सरकार से बजट मिलने के बाद ही कोरोना के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन की तलाश पूरी हो पाएगी। जानिए बिहार में जिनोम सिक्वेंसिंग क्यों जरूरी है और जांच का पूरा खर्च।

बिहार में जिनोम सिक्वेंसिंग का पहला सेंटर

इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान के माइक्रो वायरोलॉजी विभाग में जिनोम सिक्वेंसिंग का पहला सेंटर बनाया गया है। अब तक जिनोम सिक्वेंसिंग के लिए सैंपल को बिहार से बाहर भेजा जाता था। इसमें काफी समय लगता था और रिपोर्ट समय से नहीं आने के कारण समस्या होती थी। डेढ़ साल पूर्व IGIMS में जिनोम सिक्वेंसिंग के हाईटेक मशीन इंस्टॉल की गई थी। माइसेक इल्यूमिना कंपनी की इस मशीन पर पहले ट्रायल किया जा चुका है। इस मशीन पर कोई भी जिनोम सिक्वेंसिंग की जा सकती है।

कोविड पर अब तक दो ट्रायल हो चुका है। कोविड के लिए हुए ट्रायल में एक बार में 10 और दूसरी बार में 14 सैंपल के जिनोम सिक्वेंसिंग का ट्रायल किया जा चुका है। ट्रायल के लिए अब तक बजट IGIMS ही जुगाड़ करता रहा, लेकिन अब बजट नहीं होने से जिनोम सिक्वेसिंग का काम पूरी तरह से ठप है।

एक बार में 96 जांच और 15 लाख तक खर्च

IGIMS की माइक्रो वायरोलॉजी की विभागाध्यक्ष डॉ. नम्रता का कहना है, 'जिनोम सिक्वेंसिंग की जो मशीन लगाई गई है उसमें एक बार में 96 सैंपल की सिक्वेंसिंग की जा सकती है। इसकी प्रक्रिया मल्टी स्टेज में होती है। पहले लाइब्रेरी तैयार की जाती है। फिर अलग-अलग स्टेप में सिक्वेंसिंग की मैपिंग की जाती है।'

डॉ. नम्रता का कहना है, '4 से 5 स्टेप में प्रक्रिया पूरी होती है। उसके बाद भी सिक्वेंसिंग के लिए काम होता है। यह प्रक्रिया पूरी होने में 10 दिन का समय लगता है। इस पूरी प्रक्रिया में 12 से 15 लाख रुपए का खर्च आता है।' उनका कहना है, 'एक सैंपल की जांच करनी हो या फिर एक बार में 96 सैंपल की जांच की जाए, खर्च कम नहीं होता है। 12 से 15 लाख लग ही जाता है। अगर स्कैनिंग में कोई गड़बड़ी हुई या फिर सैंपल खराब निकला तो यह खर्च डबल हो जाता है। स्कैनिंग में एक बार साइकिल चलने के बाद बाधा आते ही खर्च 15 लाख से बढ़कर 30 लाख पहुंच जाता है।'

ट्रायल तो पूरा हो गया, लेकिन अब बजट चाहिए

डॉ. नम्रता का कहना है, 'ट्रायल तो डेढ़ साल से चल रहा था। इसमें कोविड का भी ट्रायल किया गया। रिजल्ट सही होने के बाद जब अनुमति मिल गई तो अब सिक्वेंसिंग का काम शुरू कर दिया गया है। सरकार ने IGIMS को बिहार के लिए सिक्वेंसिंग का सेंटर भी बना दिया है। अब खर्च करने को बजट ही नहीं है। ऐसे में सिक्वेंसिंग का काम बजट आने तक ठप रहेगा। इस कारण से अभी सरकार को जांच के लिए बाहर के लैब को ही भेजना होगा। IGIMS ने सरकार से दो साइकिल यानी दो बार में जांच के लिए बजट मांगा है। एक बार में 96 और दूसरी बार में भी 96 सैंपल की जिनोम सिक्वेंसिंग हो सकती है। अब बजट का ही इंतजार किया जा रहा है।'

इसलिए महंगी होती है सिक्वेंसिंग

डॉ. नम्रता और सीनियर साइंटिस्ट डॉ. अभय कुमार का कहना है, 'इसमें महंगे रिजेंट्स के प्रयोग होते हैं। सैंपल की लाइब्रेरी बनाने से लेकर सिक्वेंसिंग तक में बहुत खर्च आता है और इसमें काफी महंगे केमिकल का इस्तेमाल होता है। सिक्वेंसिंग तो मशीन से हो जाती है, लेकिन फिर एनालीसिस की प्रक्रिया भी काफी जटिल होती है। इस कारण से इसका खर्च महंगा होता है, लेकिन इसकी जरूरत भी कोरोना में अधिक है। नए वैरिएंट का पता तब तक नहीं लगाया जा सकता है जब तक जिनोम सिक्वेंसिंग का काम नहीं किया जाता है।'