शताब्दी समारोह: जानिए विधानसभा के 100 साल का रोचक इतिहास:इतावली पुनर्जागरण शैली पर बना है, तब इसे 'बिहार-उड़ीसा विधान परिषद' का नाम मिला था

पटना3 महीने पहले
शताब्दी समारोह कार्यक्रम के लिए दुल्हन की तरह सजकर तैयार विधानसभा भवन।

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद आज पटना आ रहे हैं। बिहार विधानसभा भवन के शताब्दी समारोह में वह 21 अक्टूबर को शामिल होंगे। कार्यक्रम को लेकर बिहार विधानसभा भवन को दुल्हन की तरह सजाया गया है। कार्यक्रम में इस बार शताब्दी वर्ष स्तंभ का शिलान्यास किया जाएगा। इसके साथ ही बौद्धि वृक्ष का शिशु पौधा भी लगाया जाएगा। राष्ट्रपति पूरे 70 मिनट तक परिसर में रहेंगे। हालांकि, 7 फरवरी 2021 को ही इस भवन ने 100 साल पूरे कर लिए।

7 फरवरी 1921 को जब विधानसभा के मौजूदा भवन का उद्घाटन तत्कालीन राज्यपाल लॉर्ड सत्येन्द्र प्रसन्न सिन्हा ने किया, तब इसे 'बिहार-उड़ीसा विधान परिषद' के नाम से जाना जाता था। 7 फरवरी 1921 को ही मौजूदा भवन में पहली बैठक हुई थी। सर वाल्टर मोड ने इसकी अध्यक्षता की थी। बिहार के पहले राज्यपाल लॉर्ड सत्येन्द्र प्रसन्न सिन्हा ने इसे संबोधित किया था। यानी देश की आजादी से 26 साल पहले ही यह भवन तैयार किया गया था। इतावली पुनर्जागरण शैली (रेनेंसा आर्किटेक्चर) में बना यह धरोहर जितना मजबूत है, उतना ही रोचक इसका इतिहास है। आइए आज हम इसे जानते हैं।

1912 तक बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा था बिहार
12 दिसंबर 1911 बिहार के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण दिन है। तब अंग्रेजी शासन में बिहार बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा था। इसी दिन बिहार को बंगाल से अलग करने की मांग पूरी हुई थी। ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम ने दिल्ली दरबार में भारतीय परिषद अधिनियम 1909 के आधार पर बिहार एवं उड़ीसा को मिलाकर बंगाल से अलग राज्य बनाने की घोषणा की।

22 मार्च 1912 को बंगाल से अलग होकर बिहार एवं उड़ीसा राज्य अस्तित्व में आया। सर चार्ल्स स्टुअर्ट बेली इस राज्य के पहले उप राज्यपाल बने। विधायी परिषद की पहली बैठक 20 जनवरी 1913 को बांकीपुर स्थित पटना कॉलेज के सभागार में हुई। नये राज्य के विधायी प्राधिकार के रूप में 43 सदस्यीय विधान परिषद का गठन किया गया। इनमें 24 सदस्य निर्वाचित एवं 19 सदस्यों को उप राज्यपाल मनोनीत करते थे। यही परिषद संख्या बल में परिवर्तनों से गुजरते हुए 243 सदस्यों के साथ आज बिहार विधानसभा के रूप में हम सबके सामने है।

1919 में बिहार एवं उड़ीसा को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला
गवर्नमेंट ऑफ इंडिया अधिनियम 1919 के तहत ‘बिहार एवं उड़ीसा’ को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला जो 1920 में साकार हुआ। हालांकि, पूर्ण राज्य का दर्जा मिलते ही बिहार में राज्यपाल की नियुक्ति हुई। इसके पहले यहां उपराज्यपाल होते थे। बिहार के पहले राज्यपाल लॉर्ड सत्येन्द्र प्रसन्न सिन्हा हुए। 1920 से पहले परिषद का अपना कोई सचिवालय या सभागार नहीं था। इसलिए इसकी बैठक अलग-अलग जगहों पर होती थी। बंगाल से अलग होने के बाद परिषद के लिए सचिवालय की जरूरत थी। इसलिए इस भवन को तैयार कराया गया।

इतावली रेनेंसा आर्किटेक्चर में एएम मिलवुड ने तैयार किया था भवन
एएम मिलवुड मौजूदा विधानसभा भवन के आर्किटेक्ट थे। इतावली रेनेंसा आर्किटेक्चर में उन्होंने इस भवन को तैयार किया। भवन में समानुपातिक गणितीय संतुलन के साथ ही सादगी व भव्यता का समन्वय है। अर्द्ध वृताकार मेहराब व गोलाकार स्तंभ इसकी खास विशेषता है। यह प्राचीन रोमन शैली से प्रभावित है।

विधानसभा भवन में बना सभा कक्ष आयताकार ब्रिटिश पार्लियामेंट से इतर रोमन एम्फीथियेटर की तर्ज पर अर्द्ध गोलाकार शक्ल में बना है। इस भवन में समरूपता का विशेष ख्याल रखा गया है। अगले हिस्से में जो प्लास्टर है, उसमें एक निश्चित अंतराल पर कट-मार्क है जो इसे बेहद खूबसूरत बनाते हैं। आर्किटेक्ट इसे इंडो-सारसेनिक आर्किटेक्चर का उदाहरण मानते हैं।

ऐसी है बिल्डिंग की संरचना
विधानसभा का मूल कक्ष सभा भवन जहां सदन का संचालन होता है, इसकी आंतरिक संरचना 60 फीट लंबी और 50 फीट चौड़ी है। इसका विस्तार इमारत के दोनों मंजिलों में है। प्रेस प्रतिनिधि के साथ-साथ दर्शकों के लिए ऊपरी मंजिल में गैलरी की व्यवस्था है। विधानसभा के अगले हिस्से की लंबाई 230 फीट है, जबकि विधानमंडल की कुल लंबाई 507 फीट है। वहीं सभा की चौड़ाई 125 फीट है।

विस्तार के बाद बने परिसर में तीन हॉल हैं। इसके मध्य भाग में 12 कमरे हैं। सभाध्यक्ष के कार्यालय कक्ष की लंबाई-चौड़ाई 18x20.9 फीट है। सबसे बड़ा कक्ष मुख्यमंत्री के लिए है। सीएम कक्ष की लंबाई व चौड़ाई 18x30 फीट है। नेता प्रतिपक्ष के लिए पहले तल्ला पर कक्ष बना है जिसकी लंबाई-चौड़ाई 18x20 फीट है। सभा सचिव व संसदीय कार्य मंत्री के कार्यालय कक्ष की लंबाई-चौड़ाई भी 18x20 फीट ही है।

संविधान बनने के बाद विधानसभा सदस्यों की संख्या 330 से ऐसे हुई 243
1935 में पारित अधिनियम के तहत बिहार और उड़ीसा को अलग राज्य बनाया गया, तब बिहार में विधानमंडल के तहत दो सदनों, विधान परिषद और विधानसभा की व्यवस्था अस्तित्व में आई। 1936 में उड़ीसा भी बिहार से अलग हो गया। 1950 में संविधान लागू होने के बाद पहली बार 1952 में चुनाव हुए। विधानसभा के लिए 330 सदस्य निर्वाचित हुए। लेकिन, 1956 में बिहार की सीमा में बदलाव के कारण निर्वाचित सदस्यों की संख्या घटकर 318 हो गई।

1977 में जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में निर्वाचित सदस्यों की संख्या 324 हो गई। हालांकि, 1952 से ही एक सदस्य मनोनीत होता रहा। 2000 में बिहार का विभाजन होकर झारखंड बना, तो विधानसभा के सदस्यों की संख्या 324 से घटकर 243 हो गई। वहीं, बिहार विधान परिषद में सदस्यों की संख्या 75 है।

रिपोर्ट : सुकांत सौरभ/बृजम पांडेय

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