सियासत में दो दरवाजे खोलकर रखते हैं नीतीश!:पलटूराम नाम रखने वाली RJD भी तैयार, DNA पर सवाल उठाने वाली BJP साथ है ही

पटना19 दिन पहलेलेखक: प्रणय प्रियंवद
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अगर बदले हालात में नीतीश कुमार भाजपा का साथ छोड़ते हैं तो वह राजद और कांग्रेस के साथ एक मजबूत सरकार बना सकते हैं। इसके लिए उन्हें और किसी पार्टी से भी तालमेल करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अभी NDA में 4 दल शामिल हैं। - Dainik Bhaskar
अगर बदले हालात में नीतीश कुमार भाजपा का साथ छोड़ते हैं तो वह राजद और कांग्रेस के साथ एक मजबूत सरकार बना सकते हैं। इसके लिए उन्हें और किसी पार्टी से भी तालमेल करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अभी NDA में 4 दल शामिल हैं।

RJD के ऑफर ने बिहार की राजनीति को गलन वाली ठंडी में भी गर्मा दिया है। जातीय जनगणना पर JDU को खुला समर्थन का ऐलान कर BJP की चिंता को बढ़ा दिया है। वहीं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सहयोगी पार्टी BJP अब RJD के साथ वाले पुराने दिन की याद दिला रही है। जब 2017 में परेशान नीतीश ने रातोंरात पाला बदल लिया था। इन सबके बीच एक बार फिर नीतीश कुमार चर्चा में हैं। अपने लिए हमेशा दोनों दरवाजा खोले रखने वाले नीतीश कुमार पर सबकी नजरें टिक गई है। सबको उनके अगले कदम का इंतजार है।

बिहार की राजनीति में समय-समय पर यह चर्चा होती रहती है कि नीतीश हमेशा दोनों दरवाजे हमेशा खुले रहते हैं या वह वैसी राजनीतिक परिस्थितियां बना कर रखते हैं कि उनके लिए दो दरवाजे हमेशा खुले रहें।

अभी की राजनीति में BJP का दरवाजा तो उनके लिए खुला ही है। वह BJP के साथ हैं ही, लेकिन, RJD और कांग्रेस के दरवाजे भी उनके लिए खुले हुए हैं। उन बयानों को भूल जाइए, जिसमें नीतीश कुमार ने कहा था कि मिट्टी में मिल जाएंगे, पर BJP के साथ नहीं जाएंगे। लालू परिवार ने नीतीश कुमार का नाम पलटू राम रख दिया वह भी भूल जाइए। भास्कर ने नीतीश की पार्टी और उनके विरोधी नेताओं से उनकी राजनीति पर बात की।

दबाव में काम नहीं करते नीतीश कुमार

राजनीतिक जानकार बताते हैं कि नीतीश कुमार राजनीति में दो दरवाजे हमेशा खोल कर रखते हैं। इसे इस रूप में आप समझ सकते हैं कि वे कम सीटों के बावजूद मुख्यमंत्री ही नहीं बन जाते बल्कि सहयोगी पार्टी के दबाव में काम नहीं करते। थोड़ा इतिहास में चलें और 80 के दशक से लेकर अब तक नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा पर गौर करें तो पाएंगे कि 1979 में जब जनता पार्टी टूटी तो सत्येन्द्र नारायण सिंह के साथ रहते हुए वे किशन पटनायक वाले लोहिया विचार मंच से जुड़े रहे।

लोहिया विचार मंच में रहते हुए वह जनता पार्टी से संबद्ध रहे। इसके बाद वे लोकदल में गए। वहां से कर्पूरी ठाकुर वाले लोकदल में आ गए। तब लालू प्रसाद भी लोकदल (च) में थे। उस समय नीतीश कुमार ने लोकदल से चुनाव भी लड़ा था। 1990 में लालू प्रसाद को मुख्यमंत्री बनाने में नीतीश कुमार की भी भूमिका रही। 1994 में नीतीश कुमार ने जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मिलकर समता पार्टी बना ली। इसके बाद उन्होंने 2003 में JDU का निर्माण किया।

JDU की सीटें ज्यादा हों या कम, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही

2005 के विधानसभा चुनाव में RJD की अगुआई वाली संप्रग गठबंधन को मात दी और बिहार के मुख्यमंत्री बने। 2010 के चुनाव में JDU को 115 और BJP को 91 सीटें आईं। नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बने, लेकिन जब BJP ने नरेन्द्र मोदी को PM कैंडिडेट घोषित किया तो नीतीश कुमार को गुस्सा आ गया और उन्होंने गठबंधन तोड़ दिया। दरवाजा उन्होंने खुला रखा था और उस दरवाजे का प्रयोग कर राजद-कांग्रेस के साथ हो गए।

2015 में महागठबंधन को 178 सीटें आईं, लेकिन 2017 आते-आते नीतीश पर लालू प्रसाद की पार्टी का दबाव बढ़ने लगा और उन्होंने BJP के दरवाजे का इस्तेमाल किया। 2020 में नीतीश कुमार ने BJP, HAM और VIP का साथ लिया। नीतीश कुमार की पार्टी JDU की 28 सीटें घट गईं और वह 43 पर आ गई, जबकि BJP की 21 सीटें बढीं और वह 74 पर पहुंच गई। इसके बावजूद BJP ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया। NDA को 125 सीटें मिलीं और महागठबंधन को 110 सीटें।

दलों के बीच दुश्मनी के बीच दरवाजा भी खुला रखते हैं

राजनीति में व्यक्तिगत दुश्मनी भले नीतीश निभाते हैं, लेकिन दलों के बीच की दुश्मनी वे समय के साथ भुलाते रहे हैं। नीतीश कुमार के शुभचिंतक कहते हैं कि यह उनकी राजनीतिक ताकत है कि लालू जैसे दुश्मन भी उनके लिए राजनीतिक दरवाजा खोल कर रखते हैं। नरेन्द्र मोदी DNA पर सवाल करने के बाद भी साथ देते हैं। इससे सोनिया-राहुल को भी उनसे गुरेज नहीं।

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