सफलता के सूत्र:धैर्य ऐसा होना चाहिए: गणितज्ञ एंड्रयू वाइल्स एक थ्योरम हल करने के लिए 7 साल लगे रहे

2 वर्ष पहले
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  • कोरोना संकट के बीच विपरीत परिस्थितियों में सफलता के सूत्र सुपर-30 के आनंद कुमार के शब्दों में

23 जून 1993 गणित के इतिहास में एक बहुत बड़ा दिन था। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में नामचीन गणितज्ञों के सामने ब्रिटिश प्रोफेसर एंड्रयू वाइल्स ने गणित का कठिनतम समझे जाने वाले 350 साल पुराने सवाल ‘फॉर्मेट लास्ट थ्योरम’ का हल प्रस्तुत करके दुनिया को अचंभित कर दिया। जब न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्टर ने वाइल्स से पूछा कि उन्हें पहली बार इस थ्योरम के बारे में कब पता चला था तब उन्होंने जबाब दिया कि 10 साल की उम्र में लाइब्रेरी में एक किताब पढ़ने के दरम्यान पहली बार उन्हें इस सवाल के बारे में पता चला। और उन्होंने उसी समय ठान लिया था कि चाहे जितनी भी मेहनत करनी पड़े, इस थ्योरम का प्रमाण खोज कर ही रहेंगें।

दरअसल ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ द्वारा घोषित गणित का कठिनतम सवाल ‘फॉर्मेट लास्ट थ्योरम’ देखने में बड़ा सरल लगता है। स्कूल का कोई साधारण विद्यार्थी भी इसे देखता है तो उसे लगता है कि इसे आसानी से हल किया जा सकता है। पायथागोरस थ्योरम बहुत मशहूर है। इसकी जानकारी सभी विद्यार्थियों को होती है। इसके अनुसार ऐसे असंख्य प्राकृत संख्याओं के सेट होते हैं जो समीकरण X2+Y2=Z2 को संतुष्ट करते हैं। उदाहरण के लिये 32+42=52 और 52+122=132 उत्सुकता ही आविष्कार की प्रेरणा स्रोत होती है। अब गणितज्ञों को लगा कि क्या किसी ऐसे प्राकृत संख्याओं के सेट को खोजा जा सकता है जो Xn+Yn=Zn को संतुष्ट करे, जहां n भी कोई प्राकृत संख्या है। फ्रांस में पियरे डी फॉर्मेट 17 वीं शताब्दी के जाने-माने वकील हुआ करते थे। वकालत करते हुए भी उन्होंने विज्ञान और गणित में महत्वपूर्ण योगदान किया है। 1665 में फॉर्मेट की मृत्यु हो गयी।

उनकी मृत्यु के 30 साल बाद उनकी एक किताब के हाशिये में लिखा पाया गया कि Xn+Yn=Zn का प्राकृत संख्या में कोई हल संभव नहीं है। इसके बाद पूरे गणित जगत में सनसनी फैल गयी। यह सवाल अब ‘फॉर्मेट लास्ट थ्योरम’ के नाम से जाना जाने लगा। दुनिया के तमाम गणितज्ञ जवाब को खोजने में लग गये। खुद फॉर्मेट ने n=4 के लिए खोज लिया था कि इसका कोई हल नहीं है। लगभग 100 साल बाद 1780 में महान गणितज्ञ यूलेर ने n=3 के लिए इसे सिद्ध कर दिया। बाद के कुछ सालों में n=5 और 7 के लिए भी इसे प्रमाणित कर दिया गया, लेकिन जब तक सभी प्राकृत संख्याओं के लिए हल नहीं मिल जाये तब तक बात नहीं बनने वाली थी। अब इस सवाल को हल करने के लिए बड़े-बड़े पुरस्कारों की भी घोषणा होने लगी। इसे हल करने के दरम्यान गणित के कई नये विभागों का आविष्कार हो गया। समय बीतता गया लेकिन ‘फॉर्मेट लास्ट थ्योरम’ अबूझ ही बना रहा। क्रांतिकारी मोड़ उस वक्त आया जब जापानी गणितज्ञ युताका तानियामा ने निष्कर्ष निकाला कि इस सवाल का संबंध एलिप्टिकल कर्व से है।

आखिरकार वह दिन भी आया जब प्रोफेसर एंड्रयू वाइल्स ने इसे हल कर दिया, लेकिन जल्दी ही कुछ गणितज्ञों ने उनके प्रयास में त्रुटि निकाल दी। कुछ समय बाद एंड्रयू ने पुराने स्टूडेंट रिचर्ड टेलर की मदद से उस त्रुटि में भी सुधार कर विजेता बन गए। एक इंटरव्यू के दौरान प्रोफेसर वाइल्स ने बताया कि वह समाधान खोजने में इतने मशगूल हो गए थे कि लगातार 7 वर्षों से वे प्रिन्सटन यूनिवर्सिटी के कैंपस से कभी भी बाहर नहीं निकले। और रिसर्च के समय फोन से भी दूर थे।

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