अशोक और औरंगजेब कंट्रोवर्सी पर बोले प्रेम कुमार मणि:मणि ने औरंगजेब की ईमानदारी के दिए उदाहरण, कहा- टोपी सीकर जरूरतें पूरी करता था

पटना7 महीने पहलेलेखक: प्रणय प्रियंवद
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प्रेम कुमार मणि। - Dainik Bhaskar
प्रेम कुमार मणि।

NDA में शामिल पार्टियों के बीच सम्राट अशोक और औरंगजेब की तुलना को लेकर विवाद जारी है। ऐसे में लेखक और चिंतक प्रेम कुमार मणि ने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखा है। इसमें उन्होंने अभिव्यक्ति के खतरे पर सवाल उठाया है। उन्होंने अशोक और औरंगजेब को लेकर कई तर्क भी दिए हैं। बता दें प्रेम कुमार मणि राजद से जुड़े हुए हैं और राजद की पत्रिका ' राजद समाचार' के संपादक भी हैं। लेकिन उनका यह विवादित पोस्ट पार्टी से ऊपर उठकर लिखा गया है।

नरेन्द्रदेव, जेपी, लोहिया, नेहरू के सबसे करीबी थी और इन्होंने ही नेहरू की हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया

मणि ने कहा है कि मेरे जानते कोई राजा किसी समाज का पुरखा नहीं होता। अशोक की परदादी ग्रीक हेलेन थी और औरंगजेब की परदादी राजपूत कन्या जोधाबाई। यदि इस विरासत को लोग आज अपने जीवन में उतारते तो इतने संकीर्ण मना नहीं होते, जैसे हैं। उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी हर किसी के लिए होनी चाहिए। दयाप्रकाश सिन्हा के लिए भी। नरेन्द्रदेव, जयप्रकाश, लोहिया जैसे लोग नेहरू के सबसे अधिक करीबी थे। इन्ही लोगों ने नेहरू हुकूमत के खिलाफ सबसे अधिक संघर्ष किया, उनकी कमजोरियां चिह्नित की।

अशोक पर चिल्लाने वाले बेनीपुरी का नाटक 'नेत्रदान' पढ़ें, अशोक के प्रति घृणा से भर जाएंगे

मणि ने लिखा है कि जो लोग अशोक को लेकर चिल्ला रहे हैं उनमें नीतीश कुमार की पार्टी के राष्ट्रीय सदर भी हैं। जो बड़े गर्व से रणवीर सेना के मुखिया की शवयात्रा में नाक फुकडाते चल रहे थे। अब अहिंसक अशोक की गरिमा को लेकर वह बाजू लहरा रहे हैं। उन्हें दयाप्रकाश सिन्हा का नाटक और वक्तव्य तो दिखलाई दे रहा है, लेकिन सोशलिस्ट रामबृक्ष बेनीपुरी का नाटक 'नेत्रदान ' का स्मरण नहीं आ रहा है। हम लोगों ने उस नाटक को हाई स्कूल के पाठ्यक्रम में पढ़ा था। पूरा नाटक खत्म करते- करते अशोक के चरित्र के प्रति घृणा से मन भर जाता है। अशोक अपने बेटे -बेटियों को भिक्षु बनाता रहा और स्वयं बुढ़ापे तक विवाह करता रहा।

पाटलीपुत्र से श्रीलंका बोधिवृक्ष की टहनी वहां रोपने के लिए गई थी, लेकिन वहां से आई थी तिष्यरक्षिता जिसने राजपरिवार को अस्त-व्यस्त कर दिया था। अंततः राजकुमार कुणाल को अपनी आंखें कुर्बान करनी पडीं। अशोक कालीन पाखण्ड को अधिक जानना है तो भीष्म साहनी की कहानी 'शोभायात्रा ' पढ़ी जानी चाहिए। अशोक को लेकर दया प्रकाश सिन्हा ने क्या लिखा है ,नहीं जानता। लेकिन उन्होंने यदि उसकी आलोचना की है ,तो क्या इसके लिए हम उन पर मुकदमा चलाएंगे ? संस्कृति की दुनिया में यह नहीं होना चाहिए।

टोपी सीकर और आयतों की प्रतिलिपि बना-बेचकर अपनी रोटी और जरूरतें पूरी करता था औरंगजेब

प्रेम कुमार मणि ने औरंगजेब के बारे में जानकारी दी है कि औरंगजेब के जमाने में बहुत खून खराबा हुआ ऐसा नहीं है। सत्ता हासिल करने के क्रम में अवश्य उसने दो भाइयों की हत्या करवाई और एक को देश से खदेड़ दिया। लेकिन उसने राजधर्म या सत्ता के लिए अपने बेटे को भी नहीं बख्शा। उसे भी देश से खदेड़ दिया, जहां उसकी मौत हो गई । उसकी व्यक्तिगत ईमानदारी थी कि टोपी सीकर और आयतों की प्रतिलिपि बना- बेचकर अपनी रोटी और व्यक्तिगत जरूरतें पूरी करता था। दक्षिण भारत में उसकी कब्र आम अवाम की तरह सड़क किनारे स्थित है। लेकिन हम हिन्दुस्तानियों का मन तो अपने ही नाम का लाट (शिलालेख ) लगाने वालों, अपनी बीबी के लिए मकबरा (ताजमहल ) बनाने वालों और पंद्रह लाख का शूट धारण करने वालों के लिए उत्फुल्ल रहता है।