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फ्लैश बैक:2010 के विधानसभा चुनाव परिणाम ने साबित कर दिया कि बिना विकास किए दोबारा चुनाव में सफलता मिलना असंभव

पटना12 दिन पहले
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फाइल फोटो
  • 206 सीटों पर जीता था एनडीए, यह किसी गठबंधन की तबतक की सबसे बड़ी जीत थी
  • बिहार विस चुनाव के इतिहास से वर्तमान तक हर रोचक मोड़ से रू-ब-रू कराएगा हमारा यह कॉलम चुनाव कल-आज और कल

(भैरव लाल दास) 2010 के विधानसभा चुनाव में राजग गठबंधन को अभूतपूर्व 206 सीटों पर विजय मिली। अब तक पूरे देश में किसी राजनीतिक गठबंधन को इतनी जबरदस्त सफलता कभी नहीं मिली थी। राजनीति के साथ विकास इस कदर जुड़ गया कि 2010 के चुनाव परिणाम के बाद चर्चा शुरू हो गई कि बिना विकास किए किसी राजनीतिक दल को चुनाव में फिर सफलता मिलना असंभव है। नीतीश कुमार का सुशासन मॉडल पूरे देश की शासन व्यवस्था के लिए मानक बन गया। दरअसल इस जीत की बुनियाद 2005-10 के बीच बिहार में हुए बदलाव का परिणाम थी।

नीतीश के सामने पहली चुनौती थी ‘रूल ऑफ लॉ’ स्थापित करने की

अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी आदि की मौजूदगी में 24 नवंबर, 2005 को गांधी मैदान में आयोजित शपथग्रहण समारोह में राज्यपाल बूटा सिंह ने जब नीतीश कुमार को राज्य के 33वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाई तब उनके सामने पहली चुनौती ‘रूल ऑफ लॉ’ स्थापित करने की थी। 51528 हत्या, 54000 डकैतियां, 24699 लूट, 17000 फिरौती के लिए अपहरण और 7290 बलात्कार की घटनाओं के आंकड़े यह समझाने के लिए पर्याप्त थे कि बिहार को संभालने के लिए उनके सामने पहला काम कानून व्यवस्था बहाल करना है।

तेजतर्रार आईपीएस अभ्यानंद और केंद्र से वापस आए आईएएस अफजल अमानुल्लाह को पुलिस डेटा बैंक बनाने का जिम्मा दिया गया। सुशासन के लिए सिविल, पुलिस महकमा को सक्रिय किया गया तो प्रथम दो वर्षों में ही 27 हजार अभियुक्तों के दोष प्रमाणित हो गए। 1989 के भागलपुर दंगे के आरोपी कामेश्वर यादव, दबंग मो. शहाबुद्दीन, अजित सरकार हत्याकांड से जुड़े पप्पू यादव जेल भेज दिए गए। आईएएस जी.कृष्णैया हत्याकांड के आरोपी आनंद मोहन, मोकामा के दबंग सूरजभान, वैशाली के मुन्ना शुक्ला आदि जब सीखचों के अंदर चले गए तो जनता का नीतीश के नेतृत्व पर भरोसा जमने लगा।

नीतियों के मोर्च पर किए काम ने साबित किया नेतृत्व क्षमता

सोशल इंजीनियरिंग के मोर्चे पर 2007 में बने महादलित कमीशन की पहलकदमी भी नतीजे दे गई। रणवीर सेना और राजनीतिक पार्टियों के बीच संबंधों के अध्ययन के लिए बने अमीर दास आयो को समाप्त कर दिया गया। भूमि सुधार के लिए भी एक समिति गठित हुई। उच्च जातियों में व्याप्त गरीबी का अध्ययन करने के लिए भी एक आयोग बना। सचिवालय से लेकर प्रखंड स्तर तक जनता दरबार का आयोजन किया गया। लोगों को शासन तक अपनी बात पहुंचाने में मदद मिली।

भ्रष्टाचार के प्रति ‘जीरो टालरेंस’ की नीति बनी। 2005 में सूचना का अधिकार बना। सेवा का अधिकार अधिनियम बना। 18 अगस्त 2008 को कुसहा तटबंध टूटने के बाद आई कोसी की बाढ़ 23 लाख लोगों के लिए तबाही का कारण बनी। इस त्रासदी में लोगों को नीतीश कुमार के सक्षम नेतृत्व का स्वाद मिला।

महिला सशक्तीकरण की दिशा ने पलट दिया पासा

1993 में हुए 73वें संविधान संशोधन के बाद पंचायत में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान किया गया था। 2006 में नीतीश कुमार ने इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया। ऐसा करने वाला बिहार पहला राज्य था। बाद में मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड ने भी ऐसी ही व्यवस्था की। महिला एवं बालिकाओं के लिए प्रोत्साहन, पोशाक और साइकिल जैसी योजनाएं बनीं। गर्भवती महिलाओं की समस्याएं और बाल मृत्यु दर रोकने पर बहस प्रारंभ हुई।

2010 के चुनाव में यही महिलाएं विधानसभा चुनाव में बूथ पर पहुंची। पुराने सारे रिकॉर्ड टूट गए। 54.5% महिलाओं ने वोट किया, जो पुरुषों से अधिक था। 34 महिलाएं चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचीं। इंफ्रास्ट्रक्चर, खासकर सड़कों के मोर्चे पर बड़ा काम हुआ। परिणाम था कि नीतीश कुमार को ‘इंडियन ऑफ द ईयर’ अवार्ड से सम्मानित किया गया। इन्हीं कामों का नतीजा 2010 के विधानसभा चुनाव में मिली प्रचंड जीत थी।

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