भास्‍कर Research:बिहार के स्कूलों में ओबीसी बच्चों की संख्या 62.1%, सामान्य 15.8% व एससी 19.5%

पटना8 महीने पहले
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यूडीआईएसई की 2020-21 की रिपोर्ट सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विभिन्न जाति वर्गों के बच्चों की संख्या पर आधारित है। - Dainik Bhaskar
यूडीआईएसई की 2020-21 की रिपोर्ट सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विभिन्न जाति वर्गों के बच्चों की संख्या पर आधारित है।

सामाजिक-राजनीतिक मोर्चे पर जातीय जनगणना का मसला चाहे जिस मुकाम पर पहुंचे, बिहार में यह जब भी हो, लेकिन, यूडीआईएसई (एकीकृत जिला शिक्षा सूचना प्रणाली) की रिपोर्ट से खासकर जातियों या उनके समूह की संख्या की झलक अभी ही सामने आ गई है।

यूडीआईएसई की 2020-21 की यह रिपोर्ट सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विभिन्न जाति वर्गों के बच्चों की संख्या पर आधारित है। इसके अनुसार, देश में ओबीसी (पिछड़ी जाति) के 44.72%, सामान्य जाति के 26.63%, अनुसूचित जाति (एससी) के 18.83% और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के 9.81% बच्चे स्कूलों में पढ़ रहे हैं।

स्कूली बच्चों की यह संख्या कमोबेश उस जाति के लोगों की संख्या की भी गवाही है। बिहार के स्कूलों में ओबीसी बच्चों की संख्या 62.11% है। वहीं सामान्य वर्ग के 15.84%, एससी के 19.5% तथा एसटी के 2.54% बच्चे पढ़ते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ओबीसी कैटेगरी के स्कूली बच्चों की सबसे ज्यादा आबादी केरल में है-67.7%। दूसरे नंबर पर तमिलनाडु है। यहां इस कैटेगरी के 67.46% स्कूली बच्चे हैं। तीसरा स्थान कर्नाटक का है। बिहार चौथे नंबर पर है।

उत्तर भारत में हम नं-1

बिहार 62.1%, यूपी 53.6% राजस्थान 48.8% एमपी 43.7% में ओबीसी बच्चे, देश में इनकी संख्या 44.72%, सबसे ज्यादा केरल में, बिहार चौथे स्थान पर

किस राज्य के स्कूलों में किस वर्ग के कितने बच्चे

ओबीसी स्कूली बच्चों के प्रतिशत के हिसाब से बिहार उत्तर भारत के राज्यों में पहले नंबर पर है। दूसर स्थान यूपी का है।

जातीय जनगणना पर जोर क्यों...दो प्रमुख वजहें

1. जातियों की संख्या-ताकत देश में जातीय जनगणना की दरकार के केंद्र में रही हैं। इसकी मांग को बड़ा एजेंडा बनाने वाली पार्टियों का कहना है कि बीते 90 वर्षों के दौरान (1931 के बाद देश में जातीय गणना नहीं) जातियों की संख्या में बहुत उलट-पुलट हुआ है। ऐसे में जातियों की संख्या की सटीक जानकारी जरूरी है, जिसको आधार बनाकर योजनाओं को अंजाम दिया जाए।

2. यह राजनीतिक मकसद भी शामिल है, जो खासकर आरक्षण के दायरे को बढ़ाने के क्रम में होने वाली कवायद से जुड़ी है। इस क्रम में जाहिर तौर पर पार्टियां यह भी दिखाएंगी, जताएंगी कि वही पिछड़ी जातियों की सबसे बड़ी हितैषी हैं। देखने वाली बात होगी कि इसमें कौन पार्टी, किससे, कितना ज्यादा आगे रहती है?

बिहार में अब तक जातीय गणना के लिए सदन में 2 बार सर्वसम्मत प्रस्ताव पास
बिहार विधानमंडल से जातीय जनगणना कराने के बारे में दो बार सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित हो चुका है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिला। केंद्र के इंकार के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार में जातीय जनगणना कराने की बात कही। इसके वास्ते सर्वदलीय बैठक होनी है। हालांकि, भाजपा विरोध के भाव में है। उसका कहना है कि उसके लिए सिर्फ दो ही जाति है-अमीर और गरीब।