अनदेखी:बरेला झील को विकसित करने की योजना मंद पड़ी

जंदाहा6 दिन पहले
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  • धार्मिक आस्था व प्राकृतिक सुंदरता का सम्मिश्रण है झील

पातेपुर-जंदाहा सीमा में प्राकृतिक झील बरैला आस्था व श्रद्धा का केंद्र है तो आसपास के इलाके के लोगों के लिए जीवनदायिनी, जैव विविधता का साकार रूप व और कुछ भी। दुनिया के कई ठंड देशों के पक्षियों का यह आश्रयस्थली भी रहा है। लगातार आखेट के कारण प्रवासी पक्षियों ने आना ही कम कर दिया है। किवदंतियों के अनुसार बारह कोस बरैला-चौदह कोस चकरैला अर्थात 12 गुणे 14 यानि 168 वर्ग कोस में बरैला फैला हुआ बताया जाता रहा है। हालांंकि बरैला की कुल सरकारी भूमि 200 एकड़ ही बची हुई है। राजस्व विभाग के बेईमान, भ्रष्ट अफसर सरकारी भूमि को स्थानीय लोगों के नाम से बंदोबस्त कर दिया।

90 के दशक में सलीम अली-जुब्बा सहनी पक्षी अभ्यारण्य के रूप में सरकार ने अधिसूचित किया। पक्षी विहार के रूप में विकसित कर प्राकृतिक पर्यटक स्थल बनाने का सपना दिखाया गया था जो अब तक फलीभूत नहीं हुआ है। वर्ष 2010 में वैशाली प्रवास के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार यहां आए थे। 17 जनवरी 2010 को बरेला झील का निरीक्षण के पश्चात आयोजित सभा में झील के विकास का उन्होंने आश्वासन दिया था। पिछले 10 सालों से विकास की बाट जोहा जा रहा है। राज्य सरकार लगातार बरैला की उपेक्षा करती आई है। इसका नतीजा यह हुआ कि सालों भर जल से लबालब रहने वाली बरैला सूखी। उसका असर पातेपुर, जंदाहा, महुआ आदि प्रखंड क्षेत्रों में भीषण जलसंकट के रूप में उभर कर आया। पर्यावरणविदों की चेतावनी पर तब केंद्र व राज्य सरकार की नींद खुली।

बरैला के गर्भ में ही प्राचीन जीवा-जोत स्थान है
बरैला न केवल एक बड़े भूभाग के लोगों के लिए जीवनदायिनी, प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर पर्यटन की असीम संभावनाएं लिए, बल्कि धार्मिक-अध्यात्मिक रूप से आस्था व श्रद्धा का केंद्र भी है। बरैला के गर्भ में ही अतिप्राचीन जीवा-जोत स्थान है। कहा जाता है कि संतान सुख से वंचित दंपत्ति दैविक-दैहिक-भौतिक उपचार करके थक चुके हों पर यहां आकर उन्हें निराश नहीं होना पड़ता। बरैला में डुबकी लगाकर जीवा-जोत स्थान पर पूजा-अर्चना करने पर निश्चय ही निराश दंपत्ति को संतान सुख की प्राप्ति होती है।

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