मदर्स डे पर मां का दर्द...:बेटी के लिए पति को छोड़ा वो मुझे ही छोड़ गई; फौजी बेटे ने नजरें फेर लीं

पटना15 दिन पहलेलेखक: आलोक द्विवेदी
  • कॉपी लिंक

जिस बेटा-बेटी काे जमाने से लड़कर काबिल बनाया, उसी ने मां को बेसहारा कर दिया। अब ओल्ड एज होम ही उनका सहारा बना हुआ है। वहां रहने वाली बुजुर्ग महिलाओं ने संचालक को ही अपना बेटा मान लिया है। अपने द्वारा ठुकराने का दर्द होने के बाद भी बच्चों का नाम सुनने के बाद बुजुर्ग मां के चेहरे पर मुस्कान छा जाती है। दैनिक भास्कर की टीम ने अकेले रहने वाली बुजुर्ग महिलाओं से बात की। सबका दर्द अलग-अलग है, लेकिन कहानी एक ही जैसी।

बेटी के लिए पति से अलग हुई, उसी ने छोड़ दिया

पति की गलत आदतों का विरोध कर इकलौती बेटी के लिए उससे अलग हो गई। बेटी प्रियंका को काबिल बनाया और एक अच्छे लड़के से शादी कर दी। अब बेटी ने अपने पति के कारण मुझे ही अपने से दूर कर दिया। ये शब्द मोतिहारी के ढाका की रहने वाली 56 वर्षीय नीलम देवी के हैं। पति, गांजा-शराब पीने के साथ ही चोरी करते थे। इसलिए बेटी की परवरिश के लिए नीलम देवी अपने पति से अलग हो गईं।

बेटी को पढ़ाया और दिल्ली के रहने वाले एक बिजनेसमैन से शादी कर दी। इसके बाद बेटी ने पति के कहने पर नीलम देवी को बेसहारा छोड़ दिया। अब वे पटना की एक ओल्ड एज होम में रहती हैं। इसके बावजूद बेटी की बात करने दौरान उनके चेहरे पर मुस्कान छा गई।

फौजी बेटे ने घर से निकाला

आरा की 63 वर्षीय इंदू देवी के पति की मौत 2000 में ही हो गई थी। पति की मौत के बाद इंदू देवी ने लोगों के घरों में बर्तन साफ करके इकलौते बेटे रौशन को पढ़ाया। रौशन फोर्स में भर्ती हो गया। शादी के बाद बेटा बॉर्डर पर दुश्मनों से लड़ाई कर रहा था और घर में बहू उसकी मां से मारपीट करती थी। फौजी बेटे ने पत्नी का पक्ष लेते हुए मां को ही घर से बाहर निकाल दिया। पटना के ओल्ड एज होम में भर्ती करने के बाद परिवार सहित दिल्ली शिफ्ट हो गया। इंदू देवी की ख्वाहिश है कि मौत से पहले एकबार पूरे परिवार के साथ रहें।

अपने काैन.... जिसे जन्म दिया या....

अपने काैन हैं? जिसे जन्म देकर पालन-पोषण करके काबिल बनाया या वह जिसने सहारा दिया? ये शब्द भोजपुर की रहने वाली पनवातो तिवारी के हैं। भास्कर टीम द्वारा काफी कुरेदने पर अपनी व्यथा बतायी। उन्होंने कहा कि प्राइवेट स्कूल में शिक्षक रह चुकी हूं। बच्चों को संस्कार देने की बदौलत ही उनकी जिंदगी चली है। ऐसे में उनका बेटा और भाई ही संस्कारहीन निकला। जब तक शरीर में ताकत थी। वे काम की बदौलत घर में रही। लेकिन, बुजुर्ग होते ही उसे घर से निकाल दिया।

'पटना के कई थियेटरों से जुड़े हुए हैं। हर दिन अलग-अलग रोल प्ले करना पड़ता है, जिसका फायदा असली जिंदगी में भी दिखाई दिया। होम में रहने वाले लोग उन्हें अपना समझते हैं। उन बुजुर्ग को होम में रखने की जगह उनके परिवार से मुलाकात करना उनकी प्राथमिकता है। सात साल के दौरान 250 लोगों को उनके परिवार से मिला चुके हैं।'

-राकेश कुमार गांधी, संचालक, ओल्ड एज हाेम

खबरें और भी हैं...