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UP में बाबा की जीत से JDU-RJD में टेंशन:बिहार में कमंडल को मंडल से काटने की रणनीति, जातीय गणना का हर राज जानिए

पटना3 महीने पहलेलेखक: वरुण राय

बिहार विधानसभा चुनाव-2020 के दौरान लोक गायिका नेहा सिंह राठौर का भोजपुरी सॉन्ग 'बिहार में का बा...' काफी हिट रहा। उस वक्त नेताओं से लेकर आम लोगों की जुबान तक पर चढ़ गया था। तब इस बहाने चुनाव में रोजगार, विकास और भ्रष्टाचार के खात्मे के वादे भी खूब हुए। उस समय लगा 52% गरीब आबादी वाला बिहार अब बदल रहा है, जाति नहीं विकास, रोजगार, इन्फ्रास्ट्रक्चर पर बातें हो रही हैं, लेकिन ऐसा था नहीं।

हकीकत है कि एक बार फिर कमरतोड़ बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार के मुद्दे गायब हो रहे हैं और जाति गिनने की मांग तेज हो रही है। राज्य के सबसे बड़े एग्जाम का पेपर आउट हो गया, लेकिन विपक्ष सोशल मीडिया से बाहर नहीं आ पाया। उल्टे अगले दिन 6 लाख अभ्यर्थियों की दांव पर लगी जिंदगी को छोड़कर तेजस्वी ने बिहार सरकार को 72 घंटे के अंदर जातिगत जनगणना पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अल्टीमेटम दे दिया। नहीं कराने पर पटना से दिल्ली तक पैदल मार्च करने का ऐलान किया।

अल्टीमेटम से परेशान मुख्यमंत्री ने आनन-फानन में उनको CM आवास बुलाया और दोबारा जाति गिनने की बातें दोहराई। इसलिए लोग कह रहे हैं बिहार में न भ्रष्टाचार बा, न महंगाई-बेरोजगारी बा, सिर्फ जाति बा...। बता दें, केंद्र की मोदी सरकार जातीय जनगणना कराने से इनकार कर चुकी है। BJP को छोड़कर राज्य की बाकी सभी पार्टियां (खासकर RJD और JDU) इसे कराने के पक्ष में हैं।

आखिर जातिगत गणना कराने के पीछे का राज क्या है? ऐसा होने से फायदा क्या है? आइए जानते हैं..., लेकिन इससे पहले पोल में हिस्सा लेकर अपनी राय दीजिए।

इससे लोगों को कम, नेताओं को फायदा ज्यादा
जातीय जनगणना कराने का मुद्दा गरमाने पर राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बिहार में आरक्षण का मामला काफी संवेदनशील है। 2015 विधानसभा चुनाव से पहले RSS प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा वाली बात से पूरा मामला पलट गया था। यही कारण है कि यहां सत्ता पक्ष हो या विपक्ष आरक्षण के मसले पर सब एकजुट हैं। इसमें लोगों को फायदा कम, नेताओं का अपना हित ज्यादा है। उनको इस मुद्दों को हवा देते ही विकास, महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे मसलों पर जवाब देना नहीं पड़ता है।

जातिगत जनगणना कराने के पीछे का तर्क

  • आजादी के बाद पहली बार 1951 में जनगणना हुई। तब से अब तक हुई सभी 7 जनगणना में SC और ST का जातिगत डेटा पब्लिश होता है, लेकिन बाकी जातियों का डेटा पब्लिश नहीं होता। डेटा नहीं होने के कारण OBC आबादी का ठीक-ठीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।
  • देश में SC और ST वर्ग को जो आरक्षण मिलता है उसका आधार उनकी आबादी है, लेकिन OBC आरक्षण का कोई मौजूदा आधार नहीं है। अगर जातिगत गणना होगी तो इसका ठोस आधार होगा।
  • दावा है कि ऐसा होने के बाद पिछड़े-अति पिछड़े वर्ग के लोगों की शैक्षणिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति का पता चलेगा। उनकी बेहतरी के लिए मुनासिब नीति बन सकेगी।

केंद्र सरकार का क्या रुख है?

  • गृह मंत्रालय ने बजट सत्र में राज्यसभा और मानसून सत्र में लोकसभा में इस तरह की जनगणना से इनकार किया है। जवाब देते हुए गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा था, 'हर बार की तरह इस बार भी केवल SC और ST कैटेगरी की जातिगत जनगणना होगी।'
  • हालांकि, 31 अगस्त 2018 को तात्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने 2021 की जनगणना की तैयारियों पर मीटिंग की थी। इसके बाद PIB ने जानकारी दी थी कि इस बार की जनगणना में OBC की गणना के बारे में सोचा जा रहा है।
  • जब भाजपा विपक्ष में थी तब उसके ही नेताओं का रुख कुछ और था। 2011 की जनगणना से पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे ने जातिगत जनगणना की मांग की थी। उन्होंने 2010 में संसद में कहा था कि अगर हम 2011 की जनगणना में OBC की गणना नहीं करेंगे, तो हम उन पर अन्याय करेंगे।

केंद्र सरकार क्यों कतरा रही है?

  • UP-बिहार में OBC का बड़ा हिस्सा क्षेत्रीय दलों का समर्थक है। पिछले चुनावों में BJP की लोकप्रियता बढ़ी है, लेकिन उनकी तुलना में वो कम है।
  • BJP की जितनी मजबूत पैठ सवर्ण जातियों में है, उतना OBC के बीच नहीं है।
  • जातिगत गणना होगी तो क्षेत्रीय दलों को केंद्र की नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में OBC कोटे में बदलाव के लिए सरकार पर दबाव बनाने का मुद्दा मिल जाएगा।
  • देश में मंडल-2 जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इस बहाने सिमटती क्षेत्रीय पार्टियों को नया जीवन मिल सकता है।

2011 में आंकड़े जुटाए गए, लेकिन जारी नहीं हुए

  • 2011 की जनगणना के दौरान UPA सरकार ने लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव के दबाव और कांग्रेस के पिछड़ी जाति के नेताओं की चाहत के कारण सामाजिक आर्थिक जाति जनगणना (SECC) कराई थी। इसके लिए 4,389 करोड़ रुपए का बजट पास हुआ। 2016 में जाति को छोड़कर SECC का बाकी डेटा मोदी सरकार ने जारी कर दिया।
  • जातियों का रॉ डेटा सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय को सौंप दिया गया। जातियों के कैटेगराइजेशन और क्लासिफिकेशन के लिए मंत्रालय ने नीति आयोग के उपाध्यक्ष की अध्यक्षता में एक कमेटी बना दी। हालांकि, इस रिपोर्ट का क्या हुआ पता नहीं।

BJP बोली- हमारे लिए दो ही जातियां- अमीर और गरीब
राज्य में राजनीतिक गहमागहमी के बीच हाल में BJP प्रदेश भाजपा अध्यक्ष डॉ. संजय जायसवाल ने कहा है, 'हमारे लिए सिर्फ दो ही जातियां हैं- अमीर और गरीब। हमारी सारी योजनाएं गरीबों को ध्यान में रखकर और उनके कल्याण के लिए ही कार्यान्वित की जाती हैं। हम किसी जाति या धर्म विशेष को देखकर या उनके कल्याण को ध्यान में रखकर योजनाएं नहीं तैयार करते। जातीय जनगणना को लेकर हम केंद्र के स्टैंड के साथ हैं। जातीय जनगणना कराने के पहले बिहार सरकार वैसे राज्यों के फायदे भी देख ले जिसने जातीय जनगणना कराई है।'