सफलता:बीपीएससी की 64 वीं परीक्षा में मिली 142 वीं रैंक से नहीं था सब्र, गौरव ने 65वीं में पहला स्थान लाकर लिया दम

सासाराम12 दिन पहले
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  • मैकेनिकल इंजीनियर की नौकरी छोड़कर शुरू की थी सिविल सर्विसेज की तैयारी

बीपीएससी की 65 वीं परीक्षा में बिहार टॉपर बनने वाले शिवसागर के चमराहां निवासी गौरव कुमार सिंह को 64 वीं परीक्षा पास करने में भी सफलता मिली थी। उस समय रैंक 142 वीं थी। जिससे गौरव संतुष्ट नहीं थे। बिहार के टॉप टेन में जाने की जिद्द के कारण गौरव ने एक बार फिर इस परीक्षा में बैठने का निर्णय लिया। जिसका परिणाम गुरूवार को घोषित हुआ तो वे टॉपर के रूप में सामने आए। पेशे से मैकेनिकल इंजीनियर गौरव ने इस परीक्षा की तैयारी के लिए अपनी नौकरी भी छोड़ दी थी।

जिनके कदम अब यूपीएससी में सफलता मिलने के बाद ही रूकने वाले हैं। यह बात दूरभाष पर खुद गौरव ने बताई। प्रारंभिक शिक्षा उनके गांव चमराहां के प्राथमिक स्कूल में हुई थी। जहां पांचवीं तक पढ़ने के बाद वाराणसी के सेंट्रल स्कूल में मामा ने दाखिला कराया। वहां से 12 वीं कर गौरव उड़ीसा के भुनेश्वर में बीटेक करने के लिए चले गए। जहां बीटेक की डिग्री मिली तो मां शशिकला सिंह के कहने पर कुछ दिन के लिए नौकरी भी कर ली। परंतु सिविल सर्विसेज का आकर्षण गौरव को उन परीक्षाओं की तरफ ले गया। जहां बीपीएससी 64 वीं में पहली सफलता मिली। फिर 65 वीं में बिहार टाॅपर बने।

उत्तरप्रदेश पीसीएस में भी मिल चुकी है सफलता
बीपीएस टॉपर गौरव सिर्फ इसकी 64 वीं व 65 वीं परीक्षाओं के सफलतम छात्र नहीं रहे हैं। बल्कि उत्तरप्रदेश पीसीएस में भी इनका चयन हो चुका है। यही नहीं दो बार यूपी पीसीएस के प्री परीक्षाओं में सफलता मिलने के बाद मेंस में सफल होते-होते रह गए। जिसकी कसक उनके दिल में अभी भी है। गौरव ने बताया कि इस बार भी दस अक्टूबर को होने वाली प्री परीक्षाओं की उनकी जबरदस्त तैयारी है। उम्मीद है कि इसी परीक्षा में यूपीएससी में अच्छी रैकिंग लाने में सफल रहेंगे। गौरव बताते हैं कि परीक्षाओं को पास करने के लिए अच्छे कोचिंग नहीं बल्कि विषय वस्तु के गहराई में ज्ञान जरूरी है। उन्होंने यह भी बताया कि परीक्षाओं के दौरान उनकी मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के अलावे ननिहाल में मिले भाषा और विज्ञान की जानकारी बहुत काम आई। नई पीढ़ी के लिए उन्होंने स्पष्ट किया कि भाषा पर पकड़ के साथ जिस विषय से तैयारी कर रहे हैं। उसकी गहराई में ज्ञान होना सफलता का मूल मंत्र है।

20 साल पहले पिता के निधन के बाद मां के साथ चले आए थे ननिहाल
मूल रूप से उत्तरप्रदेश के चंदौली जिला अंतर्गत जेवरी के रहने वाले गौरव के पिता मनोज सिंह की 2001 में अचानक हुई मौत के बाद पूरी तरह से टूट चुकी मां शशिकला सिंह के साथ वे पांच वर्ष की अवस्था में ननिहाल चमराहां अपने नाना के घर आ गए थे। जहां मामा प्रकाश सिंह और अन्य लोगों के सानिध्य में शुरू हुई पढ़ाई के साथ-साथ वहीं के मध्य विद्यालय में शिक्षक की नौकरी करने लगी मां शशि कला का सानिध्य उन्हें गहरे अध्ययन की ओर ले गया। जहां से गौरव पीछे मूड़कर नहीं देखे। मां शशिकला सिंह कहती हैं कि बचपन से ही सदैव शांत रहने वाला गौरव हमेशा किताबों में कुछ ना कुछ खोजते रहता था। उन्हें नहीं पता था कि दांपत्य जीवन के प्रारंभिक काल में ही पति के देहांत के बाद टूटा दुखों का पहाड़ बेटे की इस सफलता के आगे छोटा पड़ जाएगा। डबडबाई आंखों से शशिकला सिंह बेटे की सफलता पर ईश्वर को धन्यवाद देती हैं। बगल में बैठे गौरव के नाना नानी, मामा प्रकाश सिंह व अन्य लोगों ने भी गौरव के इस सफलता पर लंबी सांस लेकर राहत महसूस किया है।

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