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मदद की दरकार:पहले मां, और अब पिता की मौत से बेसहारा हुई गुड़िया

सासाराम11 दिन पहले
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बिक्रमगंज नगर परिषद क्षेत्र वार्ड संख्या 20 धारूपुर निवासी गुड़िया। - Dainik Bhaskar
बिक्रमगंज नगर परिषद क्षेत्र वार्ड संख्या 20 धारूपुर निवासी गुड़िया।
  • पिता की मौत के बाद अंतिम संस्कार तक के पैसे नहीं थे, पत्रकारों ने की पहल तो आगे आए लोग

प्राकृति किसे कब किस पड़ाव पर लाकर खड़ा कर दे कहा नहीं जा सकता। वैश्विक रूप से फ़ैले कोरोना महामारी में लोग मानवीय मूल्यों को भूलने के आदि होते जा रहेे हैं। 11 वर्षीय गुड़िया कुमारी ने अपने पिता के दाह संस्कार के लिए मदद के लिए घंटों आस लगाए बैठी रही। ग्रामीण सूत्रों से मिली जानकारी अनुसार बिक्रमगंज नगर परिषद क्षेत्र वार्ड संख्या 20 धारूपुर निवासी कौशल कुमार सिंह का निधन दोपहर में करीब 2 बजे हो गया। उनके निधन की खबर पर मदद के लिए कोई नहीं जुट रहा था। उनकी इकलौती पुत्री गुड़िया कुमारी (11 वर्षीय) अपने पिता के दाह संस्कार करने के लिए मदद मांगती रही। परंतु किसी ने मदद करना उचित नहीं समझा। यह खबर पत्रकारों को मिली।

पत्रकारों ने इस खबर को विभिन्न ग्रुपों में फैलाया, तब जाकर मददगारों की कतारें लग गई। लोगों ने धड़ाधड़ आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना प्रारंभ कर दिए । लोगों से मिले आर्थिक सहायता से उक्त कौशल कुमार सिंह का अंतिम संस्कार किया गया। मदद करने वालों में प्रमुख रूप से मनीष कुमार (अवर निरीक्षक, भारत सरकार) 11 सौ रुपये, आदर्श प्रिटिंग प्रेस के प्रोपराइटर सुनील चौधरी 2 हजार रुपया, शांतिनगर निवासी राम विनय पटेल लोयला पब्लिक स्कूल का प्रिंसिपल 11 सौ रुपया , राजेश ऑप्टिकल के प्रोपराइटर पिंटू तिवारी 5 सौ रुपया लाचार 11 वर्षीय युवती गुड़िया कुमारी के मृत पिता कौशल सिंह के अंतिम संस्कार करने के लिए आर्थिक मदद किया। मां का निधन भी एक माह पूर्व हो गया था। बच्ची के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

दुःख का टूटा पहाड़
गुड़िया कुमारी (11 वर्षीय) के माता पिता मजदूरी कर जीवन यापन करते थे। माता -पिता के निधन हो जाने से एकलौती पुत्री पर से माता -पिता का साया हट गया। उस पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा है। किस्मत ने उसे लावारिस की श्रेणी में ला खड़ा कर दिया। उसके पालन -पोषण की चिंता उसे सता रही है। पिता के निधन पर रोते रोते बेसुध हो जा रही थी। स्थिति यह है कि उसकी परवरिश के लिए कोई भी शख्स आगे नहीं आया है। यहां तक कि गांव के लोग भी नहीं।

कार्यपालक पदाधिकारी ने नहीं उठाया फोन
इस संबंध में नगर कार्यपालक पदाधिकारी से संपर्क करने पर अपना फोन उठाना मुनासिब नहीं समझे। ऐसे पदाधिकारी लोगों के हितों के प्रति कितना सजग है इसी से अंदाजा लगाया जा सकता ।

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