विचार-मंथन:मानव मस्तिष्क का होता है क्रमिक विकास

डेहरी सदर9 महीने पहले
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  • महिला कॉलेज के दर्शनशास्त्र विभाग में हुआ सेमिनार का आयोजन, वक्ताओं ने रखे विचार

स्थानीय महिला कॉलेज के दर्शनशास्त्र विभाग द्वारा कालेज सभागार में शनिवार को आयोजित ‘श्री अरविंद के आलोक में शिक्षा नीति एवं दर्शन’ विषय पर सेमिनार आयोजित हुआ। कार्यक्रम में श्री अरविंद दर्शन की ज्ञाता ओडिशा के कोरापुट से आईं श्वेता पद्मा ने कहा कि श्री अरविंद ने भारतीय शिक्षा में महत्वपूर्ण योगदान किया है। उन्होंने बताया कि श्री अरविंद ने सर्वप्रथम घोषणा किया कि मानव सांसारिक जीवन में भी दैविक शक्ति प्राप्त कर सकता है। वे मानते थे कि मानव भौतिक जीवन व्यतीत करते हुए तथा अन्य मानव की सेवा करते हुए अपने मानस को सुपर माइंड और स्वयं को सुपरमैन में परिवर्तित कर सकता है।

श्री अरविंद दर्शन की मर्मज्ञ और हैदराबाद से कार्यक्रम में शामिल हुईं लिपिका ने श्री अरविंद की मस्तिष्क की धारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि मस्तिष्क के विचार स्तर चित्र, मंशा, बुद्धि तथा अंतर्ज्ञान होते हैं जिनका क्रमशः विकास होता है। बताया कि श्री अरविंद ने आग्रह किया है कि शिक्षक को अपने शिष्य की प्रतिभा का, नैतिक का अर्थ द्वारा दमन नहीं करना चाहिए।

वर्तमान शिक्षा पद्धति से श्री अरविंद का असंतोष इसी कारण था कि विद्यार्थियों की प्रतिभा के विकास का अवसर नहीं दिया जाता। शिक्षक को मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विद्यार्थियों की प्रतिभा के विकास के लिए उनके प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

वक्ताओं ने श्री अरविंद के विभिन्न आयामों की चर्चा की: कार्यक्रम में विषय परिवर्तन दर्शनशास्त्र के विभागाध्यक्ष डॉ शर्मा ने किया। उन्होंने कहा कि श्री अरविंद ने भारतीय शिक्षा चिंतन में महत्वपूर्ण योगदान किया है। उन्होंने श्री अरविंद के जीवन और उनके द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन, अध्यात्म और शिक्षा में किये गए योगदान पर प्रकाश डाला।

स्थानीय श्री अरविंद सोसाइटी केंद्र के सचिव कृष्णा प्रसाद ने सोसाइटी की गतिविधियों पर प्रकाश डाला। एनएसएस कार्यक्रम पदाधिकारी आशुतोष कुमार ने सेमिनार का संचालन किया। सेमिनार का उद्घाटन प्राचार्य डॉ सतीश नारायण लाल ,दर्शनशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष शंभू शरण शर्मा, अजय कुमार सिन्हा व अतिथियों ने संयुक्त रूप से किया।

महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ सतीश नारायण लाल ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि श्री अरविंद का विश्वास था कि मानव दैविय शक्ति से समन्वित है। शिक्षा का लक्ष्य इस चेतना शक्ति का विकास करना है। वह मस्तिष्क को छठी ज्ञानेंद्रिय मानते थे। शिक्षा का प्रयोजन इन छह का सदुपयोग करना सिखाना होना चाहिए। सेमिनार में कॉलेज के शिक्षक शिक्षकेतर कर्मी और छात्राएं मौजूद थीं।

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