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नवरात्र विशेष:पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा हुई, आधुनिकता की चकाचौंध में भी सोलह कहार की परंपरा है बरकरार

शेखपुरा7 दिन पहले
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  • 1953 से कमिश्नरी बाजार में स्थापित हो रही है सोनरवा दुर्गा प्रतिमा

दशहरा पूजा को बंगाल का नकल माना जाता है। शेखपुरा की दुर्गा पूजा पर आधुनिकता की लेप काफी वर्षों से चढ़ी हुई है। प्रतिमा निर्माण से लेकर पंडाल बनाने तथा सजावट में कई आधुनिकता आ गई है, मगर जिले के दशहरा में सोलह कहार की परंपरा को लोग पिछले सैकड़ों वर्षों से बरकरार रखे हुए हैं। यहां सोलह कहार की यह परंपरा मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन जुलूस ने निभाई जाती है। शेखपुरा में दुर्गा की बड़ी प्रतिमाएं बनाई जाती है। एक ही ढांचे पर दस फीट की मां दुर्गा की विशाल प्रतिमा के साथ शेर, महिषासुर सहित अन्य देवी-देवताओं में गणेश, कार्तिक, लक्ष्मी तथा सरस्वती की प्रतिमाएं स्थापित की जाती है। इन सभी प्रतिमाओं का वजन दो टन के करीब हो जाता है।

शेखपुरा में प्रतिमाओं के विसर्जन के पिछले सौ से अधिक वर्षों से चली आ रही सोलह कहार की इस परंपरा के तहत लोग दो टन की पूरी प्रतिमा को कंधे पर उठाकर सारे शहर का परिक्रमा करते हैं। शेखपुरा शहर में दुर्गा पूजा का विसर्जन जुलूस को लगभग छह किमी की दूरी तय करनी पड़ती है। शहर की सभी प्रतिमाएं गिरीहिन्डा के खीरी पोखर में विसर्जित जी जाती है। हालाँकि इस बार प्रशासनिक आदेश के कारण सादे समारोह में माँ दुर्गा की प्रतिमा को स्थापित किया जाएगा। शेखपुरा जिले में स्वर्णकार मां दुर्गा करीब 300 वर्षों से स्थापित हो रही है, परंतु कमिश्नर बाजार में यह सन 1953 से लगातार स्थापित होते आ रही है। इसके पहले इनकी स्थापना माहुरी टोला एवं बनिया टोला में हुई थी, परंतु उसके बाद कमिश्नरी बाजार के पन्नालाल सर्राफ ने अपनी जमीन प्रतिमा की स्थापना के लिए दी, तब से आज तक ये प्रतिमा यही स्थापित हो रही हैं।

दो टन भारी प्रतिमा को उठा सोलह कहार करते है विसर्जन
सोलह कहार की इस पौराणिक परंपरा के तहत लोग कंधे पर दो टन भारी प्रतिमा को उठाकर छह किमी की पैदल यात्रा करके खीरी पोखर में उसका विसर्जन करते हैं। इस परंपरा को लेकर दुर्गा पूजा समिति के अध्यक्ष अनील कुमार वर्मा कहते हैं कि प्रतिमा विसर्जन में सोलह कहार की यह परंपरा बेटी की विदाई के भावनात्मक संबंध से जुटा हुआ है। जिस तरह नैहर से बेटी की विदाई में घर के लोग पालकी को कंधा देते हैं वहीं, भावनात्मक रिश्ता दिखाने के लिए विसर्जन जुलूस में दुर्गा की प्रतिमाओं को सोलह कहार उठाकर समूचे शहर का भ्रमण करते हैं। उन्होंने कहा कि अब प्रतिमा उठाने वाले कहारों को खोजने में समस्या झेलनी पड़ती है, फलत:पूजा समितियां प्रतिमा विसर्जन को ट्रैक्टर का सहारा लेने लगे हैं।

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