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वोट की नहीं पेट की चिंता:गांव में रोजगार देने का वादा खोखला, 1 माह में 50 हजार लोग बाहर गए

शेखपुरा8 महीने पहले
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  • कोरोना काल में दूसरे प्रदेश से घर लौटे मजदूरों को सरकार ने गांव में ही रोजगार देने का सब्जबाग दिखाया था, मगर काम नहीं मिलने पर लोग फिर परदेस की तरफ जा रहे हैं

एक-एक मत कीमती है... मतदान अवश्य करें। सूखी रोटी खाएंगे, मतदान को जाएंगे। पहले मतदान फिर जलपान जैसे नारों का गरीब मजदूरों पर कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा है। रोटी रोजगार के चक्कर में प्रशासनिक स्तर पर चलाए जा रहे सारे जागरुकता अभियान फीके पड़ रहे हैं। इन दिनों जिले के विभिन्न सड़कों पर दूसरे प्रदेशों की बस खड़ी रहती है और इन बसों में उमड़ी भीड़ को देख कर ऐसा ही लगेगा कि इन मजदूरों के लिए वोट से बड़ा सवाल रोजी-रोटी का है। जिले से हर सप्ताह 5 से 10 हजार मजदूर पलायन कर रहे है। प्रशासन द्वारा गांव में रोजगार नहीं उपलब्ध कराने पर महज एक माह में ही जिले से 50 हजार से अधिक मजदूर वोट गिराने से इंकार करते हुए वापस परदेश चले गए। ये मजदूर वोट के बाद भी जा सकते थे। लेकिन गरीबी का सवाल वोट पर भारी पड़ रहा है।

वोट नहीं पेट की चिंता, किसी की सरकार बने हमें क्या मतलब
बस में सवार मनकिया देवी कहती है यहां रहकर क्या करूं। वोट गिराने से पैसे नहीं मिलेंगे। दिल्ली जाऊंगी तो रोजगार मिलेगा। मुझे भी और मेरे पति को भी। यहां तो एक जने को भी रोजगार नहीं मिल पा रहा है। कोरोना से पूर्व दिल्ली में दोनों का रोजगार था। नेपाली मांझी ने कहा कि कोरोना से डर कर वापस शेखपुरा आया था। सरकार कहा था कि रोजगार मिलेगा। 7 महीने से घर की सारी पूंजी गवां कर बेरोजगार बैठा रहा।

परिवार की भूख की सताती है चिंता
बस पर बैठे मुकेश मांझी ने बताया कि बहन की शादी में 10 प्रतिशत पर सूद पर पैसे उठाए थे। महाजन का कर्ज काफी बढ़ गया है। यहां पर रोजगार नहीं मिल रहा है। बाहर जाकर कुछ पैसा लाएंगे तब महाजन को देंगे। जिससे महाजन का कर्ज कुछ कम होगा। वोट डालने से क्या होगा। शत्रुघ्न मांझी ने बताया कि कोसी के अंदर गांव है। कोई काम गांव में नहीं मिलता है। पिछले बार वोट डाले थे। कुछ नहीं मिला। लोग झूठ बोलते हैं।

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