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उस पैरवी की कहानी, जिसने शहाबुद्दीन को बनाया:कांग्रेस के कैप्टन त्रिभुवन सिंह एक पैरवी कर देते तो नहीं बनते बाहुबली MLA शहाबुद्दीन

सीवानएक वर्ष पहले
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यह तस्वीर 90 के दशक की है तब शहाबुद्दीन के साथ उनके गुर्गे सरेआम हथियार लेकर चलते थे। - Dainik Bhaskar
यह तस्वीर 90 के दशक की है तब शहाबुद्दीन के साथ उनके गुर्गे सरेआम हथियार लेकर चलते थे।

सीवान से RJD सांसद रहे बाहुबली नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन का निधन हो गया है। तिहाड़ जेल में सजा काट रहे पूर्व सांसद ने दिल्ली के एक अस्पताल में शनिवार की अहले सुबह अंतिम सांस ली। कोविड-19 से ग्रसित होने के बाद उन्हें हाई कोर्ट के निर्देश पर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनके निधन से समर्थक दुखी हैं। वो समर्थक जो शहाबुद्दीन का सीवान का रॉबिनहुड कहते हैं। आइए जानते हैं सीवान का रॉबिनहुड से जुड़ी यह कहानी...

बात बिहार के उस बाहुबली की है, जिनका नाम सुनते ही आज भी लोग खौफ में आ जाते हैं। उनके नाम का डर लोगों के अंदर आने वाले कई दिनों तक कायम रहेगा। हम बात कर रहे हैं सीवान के पूर्व सांसद मो. शहाबुद्दीन की। उसकी अपराध की दुनिया से राजनीति में आने के पीछे की कहानी बड़ी दिलचस्प है।

खैर हम बात कर रहे हैं उस शख्स की जिसने हैरतअंगेज खुलासा किया। उसके अनुसार 90 के दशक में बिहार के अंदर अपराध अपने चरम पर था। शहाबुद्दीन भी आपराधिक वारदात को अंजाम देने की वजह से सीवान जेल में बंद थे। उस दरम्यान मैरवा के रहने वाले और आर्मी से रिटायर्ड डॉ. कैप्टन त्रिभुवन नारायण सिंह जीरादेई से कांग्रेस के विधायक थे। साल 1985 के बिहार विधानसभा चुनाव को उन्होंने जीता था। उनकी छवि अपने एक ईमानदार नेता की थी। उस वक्त प्रतापपुर जीरादेई विधानसभा के तहत आता था। शहाबुद्दीन प्रतापपुर के ही रहनेवाले थे। उस शख्स ने बताया कि शहाबुद्दीन को एक मामले में विधायक डॉ. कैप्टन त्रिभुवन नारायण सिंह से पैरवी करानी थी। इसके लिए वह खुद विधायक से मिलने गए थे। लेकिन विधायक ने सीधे और साफ शब्दों में उस वक्त यह कह दिया था कि मैं बदमाशों और अपराधियों की पैरवी नहीं करूंगा। यह बात उस वक्त की है जब शहाबुद्दीन जेल में नहीं थे। इस घटना के बाद ही एक आपराधिक मामले में उन्हें जेल जाना पड़ा था।

सीवान के प्रतापपुर स्थित मो. शहाबुद्दीन का घर।
सीवान के प्रतापपुर स्थित मो. शहाबुद्दीन का घर।

बिहार के बाहुबली नेता का निधन

जेल से ही कर दिया था चुनाव लड़ने का ऐलान
विधायक की तरफ से कही गई बातों को लेकर वो गुस्से में थे। जेल के अंदर भी गुस्सा कम नहीं हुआ था। उसी दरम्यान 1990 का विधानसभा चुनाव होना था। शहाबुद्दीन ने चुनावी मैदान में निर्दलीय उतरने का ऐलान कर दिया। जेल से ही नामांकन दाखिल किया था। बात हर कीमत पर डॉ. कैप्टन त्रिभुवन नारायण सिंह को हराने की थी। कई तरह के दाव-पेंच खेले गए थे। उस वक्त का चुनाव बैलेट पेपर पर होता था। शख्स ने बताया कि मो. शहाबुद्दीन को जिताने के लिए उनके लोगों ने कई प्रकार के हथकंडे अपनाए थे। सबसे बड़ा हथकंडा वोगस वोटिंग का था। मुस्लिम आबादी और अपने प्रभाव वाले इलाकों में उनके लोगों ने उस वक्त बैलेट पेपर को छाप दिया था। करीब 5 हजार से अधिक वोगस वोटिंग हुई थी। इस कारण जेल के अंदर रहने के बाद भी मो. शाहबुद्दीन ने एक सिटिंग विधायक को चुनाव में हरा दिया था। यहीं से उनके अपराधी से राजनेता बनने का सफर शुरू हुआ था। पूरे 5 साल मो. शहाबुद्दीन जीरादेई के विधायक रहे।

अपराधी पाल सिंह का भी मिल गया था साथ
1990 के विधानसभा चुनाव में डॉ. त्रिभुवन नारायण सिंह को हराने के लिए मो. शहाबुद्दीन को उस वक्त जेल में दूसरे अपराधी व सीवान के रहने वाले पाल सिंह का भी साथ मिला था। जेल में ही पाल सिंह और मो. शहाबुद्दीन एक हो गए थे। दरअसल, पाल सिंह ने भी डॉ. कैप्टन त्रिभुवन सिंह से एक पैरवी करवानी चाही थी लेकिन उन्हें भी वही जवाब दिया गया था, जो शहाबुद्दीन को दिया गया था। इस कारण से पाल सिंह ने भी जीरादेई से निर्दलीय चुनाव लड़ा था। उस वक्त वो भी जेल के अंदर ही था।

1995 के चुनाव में मिला था लालू का साथ
5 साल विधायक रहने के बाद मो. शहाबुद्दीन को पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद का साथ मिला। 1995 के विधानसभा चुनाव में जीरादेई से शहाबुद्दीन दूसरी बार मैदान में उतरे, लेकिन इस बार लालू प्रसाद ने उन्हें अपनी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल का टिकट दिया था। लगातार दूसरी बार वो विधायक बने। एक साल बाद ही 1996 में लोकसभा का चुनाव हुआ। राजद ने शहाबुद्दीन को सीवान से टिकट दे दिया और वो जीत दर्ज कर लोकसभा पहुंच गए थे।