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  • Water Will Not Be Available In Any Of The Two Hundred Wells Of The City Council Area, Some Have Become Dirty And Some Have Become Useless.

लापरवाही:नगर परिषद क्षेत्र के दो सौ कुओं में से किसी में नहीं मिलेगा पानी, किसी में गंदगी तो कोई हो चुका बेकार

सीवानएक महीने पहले
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शहर के शांति वट वृक्ष के समीप कुएं भी फेंका गया कचरा। - Dainik Bhaskar
शहर के शांति वट वृक्ष के समीप कुएं भी फेंका गया कचरा।
  • जलसंरक्षण के पारंपरिक स्रोतों को सहेजने में न तो अधिकारियों ने ध्यान दिया और न ही जनप्रतिनिधि ही हैं गंभीर
  • शिकायत करने के बाद भी लोगों की नहीं सुनते जिम्मेदार, सफाई का आश्वासन के सिवा कहीं कुछ नहीं

नगर परिषद क्षेत्र में लगभग दो सौ कुआं है। लेकिन किसी का अब तक सौंदर्यीकरण नहीं हुआ। हालत यह है कि कुआं ही कचरा डंप करने की जगह बन गयी है। जल संरक्षण के लिए कुआं महत्वपूर्ण है, लेकिन यहां इसपर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। लगभग तीन दशक पूर्व तक अधिकांश गांवों में पेयजल एवं सिंचाई के लिए सबसे अधिक प्रयोग में आने वाले कुएं का वजूद समाप्ति के कगार पर आ गया है। सुविधाभोगी जनमानस को रस्सी के सहारे बाल्टी से पानी खींचना अब मुसीबत लगने लगा है। अधिकांश लोग चापाकल व सबमर्सिबल पर निर्भर हो गए हैं। शहर की बात तो दूर गांव में भी लोग अब नल पर निर्भर होने लगे हैं। शहर के कुछ कुएं में जलस्तर अच्छा है लेकिन जागरुकता के अभाव में वे गंदगी के पर्याय बन गए हैं। शांति वट वृक्ष के पास स्थित कुएं की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई है। जलस्तर नीचे चला गया है। दीवारें जर्जर हो गई है। वैसे ही खुरमाबाद, मखदूम सराये, पुरानी किला, तेलहता बाज़ार, अयोध्यापुरी, शास्त्री नगर, कागज़ी मुहल्ला, डीएवी मोड़ समेत सभी जगहों के कुओं का हाल है। स्थानीय लोगो ने बताया कि कुआं से ग्रामीण प्यास बुझाते थे। कुआं के पानी से मंदिर में पूजा-पाठ हुआ करते थे परंतु अब घर से पानी लाना पड़ रहा है। जीर्णोद्धार पर किसी का ध्यान नहीं है। कुआं पहले प्रत्येक घर की जरूरत थी परंतु अब इसके अस्तित्व पर खतरे का बादल मंडरा रहा है।

कुएं के पानी से होती थी पूजा
स्थानीय निवासी मुन्ना सिंह, सोनम सिंह, रोशनी देवी, अर्जुन मणि, नारायण तिवारी ने कहा कि हमारे पूर्वज जल संरक्षण के लिए कुआं खुदवाते थे। हर गांव में 10 से 15 कुआं होता था। आज स्थिति यह है कि गांव में एक-दो कुआं मिल जाए तो समझे की जल संचय की दिशा में अब भी ग्रामीण जागरूक हैं। पहले कुआं के पानी से भोजन बनाने, पानी पीने एवं पूजा करने काम होता था। हमारी संस्कृति कुआं की पानी को शुद्ध मानती है। छठ व्रत के दौरान व्रती कुआं के पानी से ही प्रसाद बनाती थी। वर्तमान समय में कुआं की पानी के लिए भटकना पड़ता है।

लेयर नीचे जाने से पानी की किल्लत
नगर परिषद द्वारा सार्वजनिक कुओं तक की सफाई नहीं कराई जाती है न ही उसके ऊपर जाली लगाई जाती है। शहर के तेलहता बाज़ार रंग दुकान के पास काफी पुराना कुआं है। स्थानीय लोगों ने कहा कि पहले इस कुएं का उपयोग पूजा करने से लेकर पीने के पानी के लिए किया जाता था। कुआं गंदगी और बदबू का पर्याय बन चुका है। यह सिर्फ कूड़ेदान बनकर रह गया है। लोग इसमें अपने घर का कचरा फेंकते हैं। पानी का लेयर नीचे जाने से पेयजल संकट उत्पन्न हो गया है। कुएं का अस्तित्व समाप्त होने से कोई विकल्प नहीं बचा है।

जल संरक्षण के लिए कुआं बहुत ही जरूरी
स्थानीय लोगों की माने तो एक जमाने में कुआं जल संरक्षण का महत्वपूर्ण साधन होता था। तपती धूप में कुआं मुसाफिरों के लिए पानी पीने का एक मात्र जरिया हुआ करता था। फ्रिज युग से पहले कुआं के पानी को ठंडा जल स्त्रोत माना जाता था। वर्षों पहले लोग कुआं जनहित में खुदवाते थे। पूरे गांव के लोगों के लिए कुआं खेतों की सिंचाई, स्नान व पीने के लिए पानी का महत्वपूर्ण साधन था परंतु अब यह सपना मात्र रह गया है।

करायी जाएगी सफाई
कुओं का सौंदर्यीकरण किया जाएगा। जो कुआं कचरा से भरा है उसे जल्द ही साफ कराया जाएगा। टीम गठित हो गई है। कार्य जल्द पूरा होगा।
राहुल धर दुबे, कार्यपालक पदाधिकारी, नगर परिषद।

पिपरा कन्या विद्यालय तक जाने के लिए रास्ता भी नहीं

दरौंदा | लाख कोशिश के बावजूद प्रखंड के करीब आधे दर्जन स्कूलों को आज तक रास्ता नसीब नहीं हो सका है। खेत बीच बने स्कूल भवन में बच्चे मेढ़ के सहारे पढ़ने जाने को विवश हैं। जिला प्रशासन व शिक्षा विभाग इन विद्यालयों को रास्ता मुहैया कराने में नाकाम रहा है। सबसे अधिक बरसात के मौसम में बच्चों को पढ़ने जाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। बारिश व सिचाई की पानी से स्कूल परिसर घिरे जाते हैं, जिस कारण बच्चों को जान-जोखिम में डाल पढ़ने जाना पड़ता है। धान की फसल बर्बाद न हो, इसे ले किसान खेत की कटीले तार से घेराबंदी कर दिए हैं। आज स्थिति यह हो गई है कि कई विद्यालय के रास्ते बंद हो गए हैं।
भूमिहीन स्कूलों को जमीन उपलब्ध कराने की योजना भी साकार नहीं हो सकी है। भूमि के अभाव में अभी भी कई विद्यालयों के पास अपना भवन नहीं है। जिसे भवन वाले समीप के विद्यालय में मर्ज करने के तहत विद्यालय संचालित भी हो रहे है। प्रस्ताव छह माह पूर्व ही विभाग को भेजा जा चुका है, जिस पर मुहर लगनी बाकी है। जिसे भवन नसीब हो सका है, उसके पास रास्ता उपलब्ध नहीं है। रास्ता की मांग को ले विद्यालय प्रबंधन गुहार लगाते लगाते थक चुके हैं। फिर इस समस्या का निदान नहीं निकल सका है। राहत इस बात है कि फिलहाल कोरोना महामारी के कारण स्कूलों को शिक्षण कार्य के लिए बंद किया गया है। परंतु शिक्षकों को इस विकट समस्या से आए दिन दो-चार होना पड़ रहा है। प्रखंड के प्राथमिक विद्यालय पीपरा कन्या, प्राथमिक विद्यालय हरदियरा, उत्क्रमित मध्य विद्यालय बेलदारी टोला, नया प्राथमिक विद्यालय झंझवा, जैसे कई ऐसे स्कूल हैं, जहां पर जाने के लिए या तो खेत होकर जाना पडता है या ढेरी मेढा पतली पगडण्डी के सहारे किसी तरह बच्चे एवं शिक्षक विद्यालय तक जाते है। कोई रास्ता नहीं है।

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