आस्था:संतान की लंबी उम्र के लिए मां ने रखा 36 घंटे का निर्जला व्रत

बैसा18 दिन पहले
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जीवित पुत्रिका व्रत के समापन पर पूजा अर्चना करतीं महिला। - Dainik Bhaskar
जीवित पुत्रिका व्रत के समापन पर पूजा अर्चना करतीं महिला।
  • प्रखंड में श्रद्धापूर्वक मनाया गया जीवित पुत्रिका व्रत, रविवार शाम को हुआ समापन

प्रखंड में जीवित पुत्रिका व्रत जिउतिया श्रद्धापूर्वक मनाया गया। तीन दिनों तक चलने वाले इस पर्व में पुत्रवती माताओं ने शुक्रवार को नहाय खाय के उपरांत शनिवार को अखंड निर्जला उपवास रखा तथा पूजा अर्चना कर संतान की लंबी उम्र तथा सुख समृद्धि व आरोग्य की कामना की। रविवार की शाम पूजा अर्चना के साथ व्रत का समापन हुआ ।पर्व को लेकर पौराणिक मान्यताओं के पूर्ण विधि विधान बरती गयी।व्रत का पारण अष्टमी तिथि की समाप्ति के पश्चात किया जाता है। यह पर्व तीन दिनों तक चलता है। इस पर्व की शुरुआत नहाय खाए से होती है। नहाय खाए के अगले दिन निर्जला व्रत रखा जाता है। माताएं जीवित्पुत्रिका व्रत संतान प्राप्ति और उनके लंबी आयु की कामना के लिए रखती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार गन्धर्वराज जीमूतवाहन बड़े धर्मात्मा और त्यागी पुरुष थे। युवाकाल में ही राजपाट छोड़कर वन में पिता की सेवा करने चले गए थे। एक दिन भ्रमण करते हुए उन्हें नागमाता मिली, जब जीमूतवाहन ने उनके विलाप करने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि नागवंश गरुड़ से काफी परेशान है, वंश की रक्षा करने के लिए वंश ने गरुड़ से समझौता किया है कि वे प्रतिदिन उसे एक नाग खाने के लिए देंगे और इसके बदले वो हमारा सामूहिक शिकार नहीं करेगा। इस प्रक्रिया में आज उसके पुत्र को गरुड़ के सामने जाना है। नागमाता की पूरी बात सुनकर जीमूतवाहन ने उन्हें वचन दिया कि वे उनके पुत्र को कुछ नहीं होने देंगे और उसकी जगह कपड़े में लिपटकर खुद गरुड़ के सामने उस शिला पर लेट जाएंगे, जहां से गरुड़ अपना आहार उठाता है और उन्होंने ऐसा ही किया। गरुड़ ने जीमूतवाहन को अपने पंजों में दबाकर पहाड़ की तरफ उड़ चला। जीमूतवाहन ने सारी कहानी गरुड़ को बता दी, जिसके बाद उसने जीमूतवाहन को छोड़ दिया और नागों को ना खाने का भी वचन दिया।

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