कृषि विज्ञान केंद्र:गर्मियों में खेतों की मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई करें : वैज्ञानिक

समस्तीपुर8 दिन पहले
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सिंघिया में प्राकृतिक अनुकूल खेती की तैयारी में जुटे वैज्ञानिक। - Dainik Bhaskar
सिंघिया में प्राकृतिक अनुकूल खेती की तैयारी में जुटे वैज्ञानिक।
  • प्रकृति के अनुकूल खरीफ फसल लगाने की दी जानकारी

प्रखंड के लादा कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने प्राकृतिक व समय के अनकुल खेती करने की सलाह किसानों को दी। लदा कृषि विज्ञान केंद्र परिसर में प्रकृति के अनकुल चल रही खरीफ फसल लगाने को लेकर तैयारी में जानकारी देते हुए बताया कि दिन प्रतिदिन बढ़ती लागत के कारण किसानों को काफी कठनाइयों का सामना करना पड़ रह है। अधिक लागत के बाद भी किसानों को खेतों में कम हो रही उत्पाद के कारण आमदनी घटती जा रही है। इसके कारण किसान खेती बारी करने से मुंह मोड़ रहे हैं।

कृषि विज्ञान केंद्र लादा के वरीय वैज्ञानिक डॉ. अभिषेक प्रताप सिंह ने बताया कि आज के समय में किसान कीट व रोगों से खेत में लगे फसलों को बचाने के लिए तरह-तरह के उपाय व रासायनिक दवाओं का छिड़काव करते हैं। लेकिन इसके प्रयोग से लागत में वृद्धि के साथ-साथ पर्यावरण को भी नुकसान पहुंच रहा है। किसानों को चाहिए कि खेतों में प्राकृतिक व समय के अनकुल खेती के तौर तरीकों को अपनाकर खेती करें। उन्होंने किसानो को कीट एवं रोगों फसल की बचाव को लेकर गर्मी के दिनों मिट्टी पलटने वाली हल से खेतों की गहरी जुताई आवश्य करें। इन दिनों खेतों की गहरी जुताई करने से कीट एवं रोग के अवशेष नष्ट हो जाते हैं।
खरपतवार सूखने के उपरांत खेतों में लगाएं ढैंचा
खेतों में खरपतवार भी सूखने से पैदावार में भी 10 से 15 फीसदी की वृद्धि देखी गई है। खरपतवार सूखने के उपरांत उसमें हरी खाद के रूप में ढैंचा की बीज बुआई कर 45 से 50 वें दिनों के अंतराल पर इसे जुताई कर खेत में पलट कर धान की रोपाई अथवा अन्य सब्जी वाली फसलों की बुआई करें। ढैंचा लगाने से खेत की भौतिक एवं रसायनिक दशाओं में सुधार आती है। आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति के साथ-साथ खेत में नमी को संरक्षित रखने की क्षमता में वृद्धि होती है। साथ ही खरपतवार के बीजों का अंकुरण नहीं होने के बराबर होता है। ढैचा एक ऐसा फसल है। जिसके जड़ व तना दोनों के भाग में वातावरणीय नाइट्रोजन को फिक्स करने वाले जीवाणु सक्रीय रखता है। जो नाइट्रोजन को स्थिरीकरण करने में काफी सहायक होते हैं।

खेती के साथ-साथ पशुपालन को भी बढ़ावा दिया जाए : डॉ. कुंदन कुमार
पशुपालन वैज्ञानिक डॉ. कुंदन कुमार बताया की खेती के साथ-साथ पशुपालन को भी बढ़ावा दिया जाए। क्योंकि पशुपालन और खेती एक दूसरे के पूरक हैं। किसान पशुपालन अपनाकर दुग्ध, मछली, मांस आदि के साथ वर्मी कंपोस्ट आदि का उत्पादन कर मुनाफा कमाने के साथ टिकाऊ खेती की तरफ अग्रसर होंगे। लोगो को इससे रोजगार के अवसर भी प्राप्त होंगे। इससे खेती में लागत कम होगा पर्यावरण अंकुल रहेगा। डॉ. रमेश कुमार उद्यान वैज्ञानिक ने बताया की उद्यानिकी फसलों जैसे आम, अमरूद, लीची, नींबू, कटहल इत्यादि को लगाने को लेकर निश्चित दूरी पर गड्ढे बनाकर उसमें मानसून आने के समय पौधे के प्रकार अनरूप वर्मी कंपोस्ट नीम की खली व अन्य आवश्यक सामग्री का उपयोग करते हुए गुणवततायुक्त पौधों का रोपण कर सकते हैं। मौके पर लादा विज्ञानं केंद्र के वैज्ञानिक डॉ अमृता कुमारी साहित कर्मी विकास कुमार, कुणाल कुमार ,श्याम कुमार व संजीत कुमार मौजूद थे।

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