मदर्स डे पर विशेष:जिस बच्चे काे मरा समझ रहे थे लाेग, लग चुकी थी चींटी इस ‘मां’ ने उसे कलेजे से लगाया और दिया जीवनदान

समस्तीपुर10 दिन पहले
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दूधपुरा के ममता शिशु गृह में बच्चों की सेवा में जुटी माताएं। - Dainik Bhaskar
दूधपुरा के ममता शिशु गृह में बच्चों की सेवा में जुटी माताएं।
  • जाति, धर्म, संप्रदाय, लिंग व शारीरिक कमी को भूल हर बच्चों को अपनाती है ममता गृह की माताएं, परित्यक्त बच्चों की सेवा में रहती हैं लीन

जिस नवजात काे कमियां समझकर अपने ही नदी, तालाब, नाली या झाड़ी में फेंक देते हैं, उसे ममता गृह की माताएं अपनाती हैं। उसे वाे सारा प्यार देती हैं, जाे नाै महीने गर्भ में रखकर भी नहीं देती हैं। ऐसा ही नजारा निगम क्षेत्र के दूधपुरा स्थित ममता शिशु गृह में देखने को मिलता है। जहां काम करने वाली माताएं शीला देवी, सुशीला देवी, किरण देवी, अनिता कुमारी, आशा देवी व बबिता देवी बीते पांच साल से यहां आने वाले बच्चों की जाति, धर्म, संप्रदाय, लिंग व उसकी शारीरिक कमी को भूलकर उसे अपनाती है।

ममता गृह की समन्वयक अनिपा कुमारी ने बताया कि जुलाई 2021 में रोसड़ा से अधमरी हालत में बच्ची आई थी जिसका सिर फटने से मांसपेशियां दिख रही थी। वहीं जून 2020 में मोरवा में झाड़ी में फेंके जाने से नवजात को सैकड़ों चींटियों ने खा रखा था। वहीं जनवरी 2020 में रोसड़ा में चार डिग्री तापमान में घने कोहरे के बीच पीएचसी के समीप बच्ची मिली थी। वहीं 2018 में दलसिंहसराय के रमना बाजार में 3 साल की अंधी बच्ची को परिजनों ने छोड़ दिया था। ऐसे सभी बच्चों को यहां की माताओं ने पालन-पोषण व सेवा कर जीने लायक बनाया है।

प्रेरणास्राेत हैं माताएं, अपनों की तरह ही 44 बच्चों को दिलाया परिवार
बताया गया कि ये माताएं इसलिए प्रेरणास्रोत हैं क्योंकि ये अपने बच्चों को छोड़ परित्यक्त बच्चों की सेवा में लीन रहती हैं। अब तक 44 को जीने लायक बनाया है। जिससे बच्चों को कानूनन घर व माता-पिता दिलाने में बड़ी मदद मिली है।
2017 में मिला सॉ का दर्जा : ममता शिशु गृह के प्रभारी सौरव कुमार ने बताया कि गृह को 2017 में विशिष्ट दत्तक ग्रहण संस्थान सॉ का दर्जा मिला। अब तक 49 बच्चों को यहां मां का प्रेम मिला है। इसमें 44 को कानून माता-पिता व घर मिला है। जिसमें 5 विदेश, 16 दूसरे राज्यों, 13 परिवार में पुर्नवासन, 11 का स्थानांतरण व 5 वर्तमान में गृह में हैं।

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