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कायाकल्प:प्राचीन धरोहर रामतलाई का होगा जीर्णोद्धार, कार्तिक पूर्णिमा, बामनद्वादशी के फिर लगेंगे मेले

डेराबस्सी9 दिन पहले
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साल 1974 से डंपिंग ग्राउंड में तबदील होती आ रही शहर की प्राचीन धरोहर श्री रामतलाई का साढ़े चार दशक बाद कायाकल्प होने जा रहा है। नगर प्रशासन द्वारा बस स्टैंड पर स्थित इस ऐतिहासिक धरोहर के जीर्णोद्धार प्रोजेक्ट का शुभारंभ संयोग से आज उसी बामनद्वादशी वाले दिन हुआ जिस दिन यहां श्रद्धालुओं का मेला लगता था। अहम बात यह है कि हरिद्वार से बुलाए पंडितों के हवन, महिला के सत्संगओं व जय श्री राम के उद्घोष के बीच 90 लाख रुपए के इस प्रोजेक्ट के शिलान्यस में शहर में हिंदू संगठनों के अलावा गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटियों और मुस्लिम भाइचारे ने भी हिस्सा लिया।

अहम बात यह भी है कि श्री रामतलाई में शहर का एकमात्र सरोवर पुन:स्थापित होने पर आम लोगों के अलावा पूर्वाचंल की बड़ी आबादी को भी छठ पूजा अर्चना में सुविधा मिलेगी। अभी तक प्रशासन की ओर उनके लिए किसी सरोवर आदि की कोई व्यवस्था नहीं है और पूर्वांचल के परिवारों को घग्गर नदी के प्रदूषित पानी में ही उतरना पड़ता है। हलका कांग्रेस इंचार्ज दीपइंदर ढ़िल्लों ने इस प्रोजेक्ट का रस्मी शुभारंभ किया।

तालाब को पक्का कर इसे सरोवर का रूप दिया जाएगा। साथ ही देवी देवताओं की पुरातन काल की मूर्तियां, नलकूप समेत फव्वारे व रंग बिरंगी रोशनी का प्रबंध किया जाएगा और सरोवर में छोटे ब्रिज से रास्ता मूर्तियों के दर्शन के लिए जोड़ा जाएगा। बस स्टैंड के समीप होने के कारण यहां लोगों के बैठने व आराम करने के भी खास प्रबंध किए जाएंगे। नगर परिषद 11 हिंदू संगठनों के साथ बतौर केयरटेकर इस जमीन में प्राचीन रामतलाई का पुरातनी स्वरुप कायम करेगी। श्री सनातन धर्म सभा, ब्राह्णण सभा, भारत विकास परिषद, रामलीला कमेटियां, शिव कांवड़ संघ समेत सिख व मुस्लिम भाइचारे के प्रतिनिधियों ने भी इस समारोह में हिस्सा लिया।

इस मौके रणजीत रेड्‌डी, प्रेम सिंह, कृष्ण धीमान, दविंदर सैदपुरा, उपिंदर चढ्डा, भूपिंदर शर्मा, नरिंदर मोहन, चमन सैनी, लखविंदर लक्की व विक्रांत भी मौजूद थे। सरकारी स्कूल के साथ हाइवे किनारे बस स्टैंड के पास 1 बीघा 17 बिसवे यानी करीब 1850 वर्ग गज में एक सरोवर प्रचीन काल में विकसित था। इसमें प्राकृतिक स्रोत से पानी जमा रहता था। इसमें कार्तिक पूर्णिमा और बामनद्वादशी को मेले का आयोजन किया जाता था।

शहर व आसपास के गांवों के तमाम मंदिरों के हिंडोले(भगवान की सवारी) लाकर यहां पूजा अर्चना की जाती थी। इसके नवीनीकरण का उर्दु में साल 1938 में लगा पत्थर आज भी मौजूद है। 50 वर्ष से अधिक आयु के स्थानीय लोग बताते हैं कि 1974 तक यहां मेला भरता रहा परंतु उसके बाद नाजायज कब्जों व उदासीन प्रशासन के चलते इसकी सुध किसी ने नहीं ली और अच्छा भला सरोवर सूखकर गंदगी के डंपिंग ग्राउंड में तबदील होता चला गया। जीर्णोद्वार शुरु होने से कार्तिक पूर्णिमा और बामनद्वादशी के चार दशक से बंद मेले भी अब फिर से लगने लगेंगे।

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