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वैलेंटाइन डे का अविस्मरणीय तोहफा:15 साल से था इंतजार, एक डॉक्टर ने वो कर दिखाया जिसके लिए औरों ने खड़े कर दिए थे हाथ... एक साल की हुई नन्ही परी

चंडीगढ़5 महीने पहले
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ऑबस्ट्रेटिक्स एंड गाइनोकॉलोजिस्ट डॉ.स्वप्ना मिसरा, बेटी जोवनप्रीत कौर के साथ जसविंदर कौर और रामदीप सिंह(बाएं से दाएं). - Dainik Bhaskar
ऑबस्ट्रेटिक्स एंड गाइनोकॉलोजिस्ट डॉ.स्वप्ना मिसरा, बेटी जोवनप्रीत कौर के साथ जसविंदर कौर और रामदीप सिंह(बाएं से दाएं).

हर औरत की तरह फतेहगढ़ साहिब की जसविंदर कौर का भी मां बनने का सपना था। लेकिन सेहत बद से बद्दतर होती गई और यहां तक खराब हो गई कि एक एक्सपर्ट डॉक्टर ने इतना तक कह डाला कि आप बच्चे की आस छोड़ दें। ये आपके लिए जान का खतरा साबित हो सकता है। बस इसके बाद जैसे जसविंदर कौर अंदर तक टूट गईं और सारा दिन आंसु बहाती रहतीं।

लेकिन एक दिन उसकी मुलाकात एक ऐसी डॉक्टर से हुई जिसने उसे बस इतना कहा कि जैसे मैं कहती हूं, वैसे करती जाओ। जसविंदर ने डॉक्टर का कहना माना और डॉक्टर ने भी उसकी उम्मीदों पर खरा उतरते हुए पिछले साल 14 फरवरी को वैलेंटाइन डे के दिन जोवनप्रीत कौर नाम की 2.8 किलो की सौगात उसकी झोली में डाल दी। आज जोवनप्रीत एक साल की है और उसे जन्म देने वाली जसविंदर कौर और उनके पति रामदीप सिंह बेहद खुश हैं। शादी के 15 साल बाद दोनों को बच्चा हुआ। इस यूनीक केस को हैंडल किया था सिटी बेस्ड ऑबस्ट्रेटिक्स एंड गाइनोकॉलोजिस्ट डॉ.स्वप्ना मिसरा ने।

डॉ.स्वप्ना मिसरा ने बताया कि जसविंदर कौर एक हाई रिस्क पेशेंट थीं।किसी भी सर्जरी से उन्हें और उनके बच्चे को काफी रिस्क हो सकता था। वे पहले से ही 40 साल की हो चुकी थीं। उन्हें 2014 में हार्ट अटैक आ चुका था जिसके कारण हार्ट स्टेंटिंग हो चुकी थी। इसके अलावा डायबिटीज,हाई ब्लडप्रेशर,अस्थमा और मोटापे से भी पीड़ित थीं। मां की हार्ट अटैक से मौत हुई थी और पिता भी इसी रोग से पीड़ित हैं। इसके अलावा 2007 में पहले बच्चे को प्रेग्नेंसी के दौरान 8वें महीने में हाई ब्लडप्रेशर के कारण खो दिया था। उसके बाद 2009 और 2010 में लगातार दो बार एबॉर्शन हुआ। एक अन्य बच्चे को डॉक्टर बचा नहीं पाए।

डॉक्टर के लिए होती है जीवन और मौत की परिस्थिति

जसविंंदर के हार्ट का इलाज करने वाले डॉक्टर ने ही उन्हें डॉ.स्वप्ना मिसरा से मिलाया। तभी जसविंदर ने डॉक्टर से रोते हुए कहा कि कैसे भी करके मेरी झोली भर दो। इसके बाद डॉक्टर ने साथ बढ़ने के लिए कहा।डॉ. मिसरा बताती हैं कि इस केस के लिए उन्होंने डायबिटिशियन,कार्डियोलॉजिस्ट सहित 8 से 10 डॉक्टर्स की टीम का गठन किया। जसविंदर का इलाज शुरू किया और जब डिलिवरी का समय आया तो सिर्फ तीन दिन ही जसविंदर को अस्पताल में भर्ती कर डिलिवरी करवाई। तीसरे दिन छुट्‌टी दे दी। डॉ. मिसरा बताती हैं कि एक डॉक्टर के तौर पर ऐसे केस बेहद चैलेंजिंग होते हैं क्योंकि यहां जीवन और मौत की परिस्थिति हाेती है। एक को जिंदगी देनी होती है तो दूसरे को जिंदा घर भेजना होता है। डिलिवरी के समय पर यह स्ट्रेस रहता है कि मुझ से लिया गया यह फैसला कहीं गलत न हो जाए। इसलिए उस वक्त भगवान से ही रास्ता दिखाने के लिए कहते हैं।