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साइंटिफिक आर्टिस्ट को ट्रिब्यूट:चंडीगढ़ को आर्ट और साइंस का फ्यूजन दिखाने वाले न्यूरो आर्टिस्ट विनोद मेहता का निधन

चंडीगढ़3 महीने पहले
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सितंबर 9, 1950 में जन्मे विनोद मेहता को तीस सेकेंड में पेंटिंग बनाने का रिकार्ड चौदह साल की उम्र में बनाया। इसके लिए तब के प्रेसिडेंट डॉक्टर राधा कृष्णन ने ऑफिस बुलाकर सम्मानित किया। उनकी पेंटिंग्स को नेशनल ब्रेन रिसर्च सेंटर के साथ-साथ चंडीगढ़ आर्ट्स म्यूजियम, पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड, एयर फोर्स स्टेशन थ्री बी आर डी चंडीगढ़, शहीद मेमोरियल ट्रस्ट लुधियाना, साई बाबा ओल्ड एज होम चंडीगढ़ में डिसप्ले हैं। - Dainik Bhaskar
सितंबर 9, 1950 में जन्मे विनोद मेहता को तीस सेकेंड में पेंटिंग बनाने का रिकार्ड चौदह साल की उम्र में बनाया। इसके लिए तब के प्रेसिडेंट डॉक्टर राधा कृष्णन ने ऑफिस बुलाकर सम्मानित किया। उनकी पेंटिंग्स को नेशनल ब्रेन रिसर्च सेंटर के साथ-साथ चंडीगढ़ आर्ट्स म्यूजियम, पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड, एयर फोर्स स्टेशन थ्री बी आर डी चंडीगढ़, शहीद मेमोरियल ट्रस्ट लुधियाना, साई बाबा ओल्ड एज होम चंडीगढ़ में डिसप्ले हैं।

कला को विज्ञान से जोड़कर कैनवास पर उतारने वाले चंडीगढ़ के आर्टिस्ट विनोद मेहता ने हार्ट फेलियर के चलते दुनिया को अलविदा कह दिया है। सत्तर साल की उम्र के आर्टिस्ट आर्ट और साइंस के फ्यूजन को रंगों में ढालते थे। यह बताया विनोद मेहता के बेटे निखिल मेहता ने। पिता की पेंटिंग के बारे में बताते हुए वह बोले- वे कई बीमारियों के दिमाग पर होने वाले असर, योग का दिमाग पर होने वाला सकारात्मक असर को रंगों के माध्यम से दिमाग के न्यूरॉन्स के जरिए दिखाते थे।

वह कहा करते थे - मेरे इन एक्सपेरिमेंट से अगर युवा विज्ञान और कला की ओर प्रेरित होते हैं तो मैं सही रास्ते पर हूं। अंगुलियों से कुछ सेकेंड में पेंटिंग तैयार करने का रिकाॅर्ड भी उनका था। उनका ज्यादातर काम दिमाग से जुड़ा था, इसलिए उनकी कुछ पेंटिंग्स नेशनल ब्रेन रिसर्च सेंटर में भी डिस्प्ले पर हैं। लॉकडाउन के चलते भी कोरोना का दिमाग पर असर इस विषय पर रिसर्च कर रहे थे। कोरोना का डीएनए, सेल और दिमाग पर होने वाले असर को भी पेंटिंग के माध्यम से दिखाया। 2005 और 2007 में चंडीगढ़ एडमिनिस्ट्रेशन की ओर से उनकी पेंटिंग्स की एग्जिबीशन को स्पॉन्सर किया गया।

उनकी कला देखकर युवा साइंस की ओर प्रेरित होते

PGI एनल्स ऑफ न्यूरोसाइंस के एडिटर इन चीफ प्रो. अक्षय आनंद ने कहा-भारत में बहुत कम लोग ऐसे हैं, जो साइंस और आर्ट के फ्यूजन पर काम कर रहे हैं। उनमें से एक थे आर्टिस्ट विनोद मेहता। साइंस और आर्ट फ्रेटरनिटी में उनकी कमी बहुत खेलेगी। याद है जब उन्होंने साइंस कम्युनिटी को ऐसी पेंटिंग तैयार करके दी, जिसमें इंटरनल ब्रेन की फंक्शनिंग को बखूबी दिखाया गया। वह ह्यूमन माइंड से जुड़े कॉन्सेप्ट को कैनवास पर उतारते थे। ऐसी कला देखकर युवा साइंस की ओर प्रेरित होते थे।

मैं उनके साथ न्यूरो साइंस की बातें साझा करता था, फिर एक साथ बैठते थे तो वह साइंस काे कला से जोड़कर रंगों में ढाल देते थे। उनकी कला के कुछ अंश नेशनल ब्रेन रिसर्च इंस्टीट्यूट में भी हैं। कुछ दिन पहले उनसे बात हुई तो उन्होंने एग्जिबीशन लगाने की इच्छा जताई थी, ताकि उससे इकठ्ठा हुए पैसों को साइंस और कला पर एक साथ काम करने वाले बच्चों को दे सकें।

अंगुलियों के जादूगर, कुछ ही मिनटाें में पेंटिंग बना देते थे

थिएटर फॉर थिएटर के निदेशक सुदेश शर्मा कहते हैं- जितने अच्छे वह कलाकार थे, उससे बेहतरीन इंसान थे। हर किसी से शांति से बात करना और लहजा हमेशा प्यार भरा। उनकी खासियत यही थी कि अंगुलियों को पेंट में डुबोकर कुछ ही मिनटाें में ऐसी तस्वीर सामने रख देते थे, वैसी पेंट से भी उभरकर नहीं आती। न्यूरोसाइंस एक्सपर्ट और कलाकार का ऐसा मिश्रण थे जो उत्तर भारत में किसी में नहीं था। पिछले थिएटर फॉर थिएटर फेस्टिवल में उनकी एग्जिबीशन लगी तो बड़ों के साथ-साथ युवाओं ने भी उनसे बहुत कुछ सीखा। इस बार के टीएफटी विंटर थिएटर फेस्टिवल में उनकी कमी बहुत खलेगी।

मेंटल इलनेस को कला के माध्यम से कम करने पर कर रहे थे रिसर्च

पब्लिक स्पीकर एंड आर्टिस्ट सर्वप्रिय निर्मोही बोले- मैंने ऐसा कलाकार नहीं देखा जो कुछ ही सेेंकेंड और मिनट में अपने भावों को कैनवास पर उतार देता हो। सीधे पेंट ब्रश उठाकर तस्वीर बना देना। क्योंकि वह न्यूरॉन्स पर काम करते थे, इंसानी दिमाग की तो यूं तस्वीर बना देते थे, मानो किसी का पोस्टमार्टम कर दिया हो। मेरा उनसे रिश्ता तकरीबन छह साल पुराना है। आर्ट प्रोजेक्ट के लिए हम एक साथ कटक गए थे, वहां उनकी तबीयत नासाज हुई तो बहुत मायूस हुए।

उनके हार्ट में नब्बे से ज्यादा प्रतिशत ब्लॉकेज थी। मगर जब-जब हम मिलते, मेरी कोशिश रहती कि वह ठीक होकर फिर से कला से जुड़ जाएं। ठीक होने पर उन्होंने फिर से आर्ट में ही ध्यान देना शुरू किया। आर्ट के माध्यम से वह शिजोफ्रेनिया, मेंटल इलनेस पर भी रिसर्च कर रहे थे। योगा का दिमाग पर होने वाले असर को भी बखूबी अपने कैनवास पर दिखाते थे।

विनोद मेहता के बारे में

सितंबर 9, 1950 में जन्मे विनोद मेहता को तीस सेकेंड में पेंटिंग बनाने का रिकार्ड चौदह साल की उम्र में बनाया। इसके लिए तब के प्रेसिडेंट डॉक्टर राधा कृष्णन ने ऑफिस बुलाकर सम्मानित किया। उनकी पेंटिंग्स को नेशनल ब्रेन रिसर्च सेंटर के साथ-साथ चंडीगढ़ आर्ट्स म्यूजियम, पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड, एयर फोर्स स्टेशन थ्री बी आर डी चंडीगढ़, शहीद मेमोरियल ट्रस्ट लुधियाना, साई बाबा ओल्ड एज होम चंडीगढ़ में डिस्प्ले हैं।