एक्सपर्ट्स की राय:तेज बुखार, सांस लेने में ज्यादा दिक्कत हाे तभी कराएं HR CT  स्कैन

चंडीगढ़4 महीने पहले
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प्राे. नवीन कालरा कहते हैं कि किसी काे मामूली बुखार और गला खराब है ताे उसे HR CT स्कैन की जरूरत नहीं है। अगर आक्सीजन सेचुरेशन गिरता है ताे सबसे पहले उसे अपना एक्सरे करवाना चाहिए। - Dainik Bhaskar
प्राे. नवीन कालरा कहते हैं कि किसी काे मामूली बुखार और गला खराब है ताे उसे HR CT स्कैन की जरूरत नहीं है। अगर आक्सीजन सेचुरेशन गिरता है ताे सबसे पहले उसे अपना एक्सरे करवाना चाहिए।

काेराेना काल की सेकंड वेव में RT-PCR रिपाेर्ट निगेटिव आने पर काेराेना संक्रमण है या नहीं इसकी पुष्टि HT हाई रेजुलेशन CT स्कैन के जरिए की जा रही है। इस बारे में मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि CT स्कैन से हम काेराेना संक्रमण की पुष्टि नहीं कर सकते। काेराेना संक्रमण की पुष्टि ताे RT-PCR के आधार पर ही हाेगी।

हां, अगर मरीज में काेविड के लक्षण हैं और RT-PCR निगेटिव आ रहा है तभी हम HR CT स्कैन से डायग्नाेस करते हैं। कई बार मरीज के लंग्स में प्लाेमनरी थ्रंबाेएंबाेलिज्म यानी छाती की खून की नाड़ियाें में ब्लाॅकेज हाे जाती है। इसके अलावा ब्लैक फंगस जैसी बीमारियाें का CT स्कैन से ही पता चलता है। यह बताया इमेजिंग के रेडियाेग्नाेसिस एंड इमेजिंग डिपार्टमेंट के प्राे. नवीन कालरा ने।

प्राे. कालरा कहते हैं कि किसी काे मामूली बुखार और गला खराब है ताे उसे HR CT स्कैन की जरूरत नहीं है। अगर आक्सीजन सेचुरेशन गिरता है ताे सबसे पहले उसे अपना एक्सरे करवाना चाहिए। एक्सरे में इंफेेक्शन ज्यादा नजर आता है तभी हम HR CT स्कैन करने की सलाह देते हैं। उन्हाेंने आगे बताया कि काेराेना काल में PGI में 1000 CT स्कैन किए गए।

खास बात यह रही कि हमने ज्यादा जाेर एक्सरे पर दिया। काेविड के दाैरान में 15000 एक्सरे किए गए। जहां तक CT स्कैन से हमारी बाॅडी पर 300 से 400 एक्सरे के बराबर रेडिएशन जाने का सवाल है ताे इसमें भी हम यह स्पष्ट करते हैं कि PGI में इतनी एडवांस मशीनें हैं कि इनके जरिए अगर HR CT स्कैन करते भी हैं ताे मरीज काे 50 से 75 एक्सरे के आसपास ही रेडिएशन का खतरा रहता है।

हम CT स्कैन उसी मरीज का करते हैं जिसकाे ज्यादा जरूरत हाेती है। लेकिन आसपास के इलाकाें में चले जाएं ताे वहां पर मशीनें ज्यादा एडवांस न हाेने की वजह से रेडिएशन का खतरा बढ़ने की आशंका रहती है। जैसे CT स्कैन करते हुए आपका मरीज से डायरेक्ट काॅन्टेक्ट हाेता है, डर नहीं लगता? इस पर बाेले- मुझे याद है कि फर्स्ट वेव में हमें पहले काेराेना पाॅजिटिव मरीज का CT स्कैन करना था ताे उस समय थाेड़ा डर लगा था।

PPE किट पहनकर रेडियो डायग्नोसिस डिपार्टमेंट से न्यू नेहरू हाॅस्पिटल में मरीज का CT स्कैन करने गए थे, CT स्कैन करने के लिए पहली बार PPE किट पहनी थी। हम लाेग एंबुलेंस में बैठकर गए थे। लेकिन अब ताे यह हमारी आदत में शुमार हाे गया है। मेरी वाइफ GMCH-32 के आई डिपार्टमेंट में प्राेफेसर हैं। बिटिया भी MBBS कर रही है। छाेटा बेटा अभी 11वीं में पढ़ रहा है। क्याेंकि हम सभी इसी पेशे से हैं ताे अब हमें ज्यादा डर नहीं लगता। हम सभी काेराेना प्राेटाेकाॅल का पालन करते हैं।

प्रोफेसर कालरा ने बताया-यहां इंटरवेंशनल रेडियाेलाॅजी के लिए पहली बार एक मरीज रेफर हाे कर आया था। उस मरीज काे चाेट लगने की वजह से गुर्दे में फिस्टुल बन गया था। जिसे हमें इमेज गाइडेंस से काॅइल डालकर बंद करना था। टेस्ट करने पर पता चला कि मरीज काेविड पाॅजिटिव है। क्याेंकि हमारे डिपार्टमेंट के लिए पहला मरीज था, उस समय काेविड प्राेटाेकाॅल काे सही तरीके से पालन नहीं कर पाए थे। उस समय पूरी टीम काे भय था। इस प्राेसिजर में हमें 6 घंटे लगे थे, यह केस काफी चुनाैतीपूर्ण रहा।

प्रो.अजय कुमार।
प्रो.अजय कुमार।

ब्लैक फंगस के 50 मरीजों की सीटी कर चुके

रेडियाेग्नाेसिस एंड इमेजिंग डिपार्टमेंट के ही प्राे. अजय कुमार ने ब्लैक फंगस के मरीजाें के बारे में बताया कि हमारे यहां म्यूकाेर माइकाेसिस यानी ब्लैक फंगस 20 पेशेंट हैं, जिनका इलाज चल रहा है। हालांकि मरीज ताे 200 के करीब हैं। लेकिन हम इमेजिंग के जरिए यह बता देते हैं कि मरीज के ब्रेन में चेहरे के आसपास कितना फैल चुका है। बीमारी कितनी खतरनाक है। उसी के आधार पर बीमारी का इलाज किया जाता है। हम ये भी बता देते हैं कि काैन सी नस या ब्रेन के किस हिस्से तक फंगस पहुंच चुका है। इसका कितना नुकसान हाेने वाला है ताे उन्हें सही समय पर सही इलाज मिल जाता है। इससे उनके ठीक हाेने की संभावना बढ़ जाती है। मरीजाें काे घबराने की जरूरत नहीं है। अगर सिम्टम हैं ताे तुरंत डाॅक्टर से सलाह लें। ऐसे ही 40 से 50 मरीजाें की हम CT स्कैन कर चुके हैं।

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