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संडे रीडिंग:ऐसा सरकारी मकान जो 64 साल से एक ही परिवार के पास, 1972 से रह रहे एक ही परिवार के लोग

चंडीगढ़3 महीने पहले
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अपनी पत्नी के साथ सतीश कुमार। - Dainik Bhaskar
अपनी पत्नी के साथ सतीश कुमार।
  • चंडीगढ़ में ऐसे सरकारी मकान न के बराबर हैं, जहां एक ही परिवार की तीसरी पीढ़ी रह रही हो

घर सिर्फ ईंट-पत्थर, सीमेंट-बजरी से बनी चारदीवारी नहीं होती, इससे हमारी यादें जुड़ी होती हैं। घर हमारा सुख-दुख समेटे होता है। ऐसा ही एक घर है सेक्टर-15डी के मकान नंबर 3137 में। प्रशासन का यह सरकारी मकान वर्ष 1956 में चौधरी साधू राम को अलाॅट हुआ। वह पुलिस में थे, लाहौर में।

वहां से चंडीगढ़ आए, पंजाब पुलिस में नौकरी लगी, डीएसपी तक की रैंक हासिल की। मकान यही रहा। साधू राम के बड़े बेटे सोहनलाल की नौकरी भी चंडीगढ़ प्रशासन के इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट में लग गई। साधू राम रिटायर हो गए, लेकिन मकान बरकरार रहा, क्योंकि 1972 में यही मकान सोहनलाल को अलॉट हो गया।

सोहनलाल की आक्समिक मृत्यु के बाद 1979 में उनके बेटे सतीश कुमार को अनुकंपा के आधार पर इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट में नौकरी मिल गई और यह मकान भी अलॉट हो गया। 41 साल की नौकरी पूरी करने के बाद सतीश 31 जनवरी को रिटायर हो रहे हैं। अगले डेढ़ साल भी यह मकान उनके पास ही रहेगा, लेकिन पत्नी के नाम पर। पत्नी सरकारी कॉलेज में लेक्चरर हैं।

बड़े मकान के योग्य थे, लेकिन यहां हमारी तीन पीढ़ियों की यादें हैं

सतीश कहते हैं- मेरा जन्म इसी घर में हुआ, 1962 में। हमारे घर के सामने की तरफ उस वक्त घर बने ही नहीं थे, झाड़ियां थीं जहां हम बच्चे छुपन-छुपाई खेलते थे। 1970 के बाद सामने दो मंजिला मकान बनने लगे। वहां जो लोग रहते हैं वे आज भी इन मकानों की लाइन को ‘नए क्वार्टर’ ही कहते हैं। मैं सेक्टर-22 में साइकिल से अपने ऑफिस जाता था। ज्यादातर दिन ऐसे होते थे कि सड़क पर एक भी गाड़ी नजर नहीं आती थी। साइकिल बिना कहीं रोक 7 मिनट में ऑफिस पहुंच जाता था।

पत्नी वर्ष 2004 में ही बड़े घर (9 टाइप) के लिए योग्य थी। मैं वर्ष 2016 में 10 टाइप मकान के योग्य था, लेकिन शुरू से यहां रहते रहे इसलिए बड़े अकोमोडेशन में नहीं गए, लगाव ही कुछ ऐसा था। हमने यहां कुछ बदला भी नहीं है, सिर्फ फ्लोर पर टाइलें लगवाई हैं। पत्नी की करीब डेढ़ साल की नौकरी बची है, तब तक यहीं वक्त गुजारेंगे।

सतीश के भाई संजीव चौधरी कहते हैं- पूरी तरह याद तो नहीं है लेकिन दादा से सुना था कि उस वक्त इस मकान का महीने का रेंट 1 या 2 रुपए तक ही कटता था। 30 पैसे प्रति यूनिट बिजली थी। (सोहनलाल के समय रेंट 10-12 रुपए महीना था, अभी 150 रुपए है)

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