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मानवता की मिसाल शामलाल:26 साल में 30 हजार लावारिस अस्थियों को गंगा में किया विसर्जित, कोरोना वायरस से मरे लोगों का संस्कार भी किया और पिंडदान भी

चंडीगढ़एक वर्ष पहले
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फाइल फोटो - Dainik Bhaskar
फाइल फोटो

17 अप्रैल 1995 को पत्नी का निधन हुआ। पत्नी की याद में सेक्टर-25 के श्माशनघाट में जाकर बैठने लगा। यहां देखा कि कई अस्थियों का विसर्जन होता ही नहीं। लोग संस्कार तो कर देते थे, लेकिन पिंडदान नहीं करते थे। पूछने पर पता चला कि कई गरीब लोग ऐसे हैं, जो अस्थियां विसर्जित करने में सक्षम नहीं हैं। लावारिस अस्थियां भी ऐसे ही पड़ी रहती हैं।

यहीं से मन में विचार आया कि कुछ सेवा की जाए। शुरुआत में आठ-दस अस्थियों का हरिद्वार जाकर विसर्जन किया। इसके बाद तो मानो यह जिंदगी का मकसद ही बन गया। मानवता के नाते पिछले 26 साल से यह सेवा जारी है। यह कहना है चंडीगढ़ पुलिस से बतौर इंस्पेक्टर रिटायर हुए शाम लाल का। शाम लाल अब तक करीब 30 हजार अस्थियां हरिद्वार और कनखल में विसर्जित कर चुके हैं।

पत्नी के निधन के बाद श्मशानघाट गया तो पता चला कि कई अस्थियां विसर्जित ही नहीं होतीं...

3 अप्रैल 1995 को पत्नी ने बेटे को जन्म दिया। लेकिन 14 दिन बाद ही 17 अप्रैल 1995 को पत्नी का निधन हो गया। पत्नी की याद में मैं सेक्टर-25 के श्मशानघाट में जाकर बैठने लगा। देखा कि कई अस्थियां वहीं रखी रहती थीं। इसके बाद मनीमाजरा, पंचकूला-सेक्टर 20 के श्मशानघाट में गया तो वहां भी यही हाल दिखा। फिर मन में विचार आया कि क्यों न इन्हें गंगा में विसर्जित कर मोक्ष के रास्ते पहुंचाया जाए।

इसके बाद अस्थियों को इकट्‌ठा कर उनके विसर्जन का काम शुरू कर दिया। शुरुआत सेक्टर-25 के श्मशानघाट से की। यहां 8-10 अस्थियां लावारिस रखी हुई थीं। इन्हें बस से हरिद्वार लेकर जाना शुरू किया। उस समय सेक्टर-25 में आचार्य शाम लाल होते थे, उन्होंने कई बार कहा- ‘बेटा यह काम आसान नहीं है, ज्यादा दिन नहीं कर पाओगे’। लेकिन मैंने हार नहीं मानी।

अपने जरूरी काम छोड़कर हरिद्वार जाता रहा। कई बार घर पर झूठ बोला, कहा कि ऑफिस के काम से हरिद्वार या मेरठ जा रहा हूं। बच्चे छोटे थे। उनकी परवरिश पर असर न पड़े, इसलिए मैंने दूसरी शादी कर ली। जब मेरा हरिद्वार और कनखल का आना-जाना बढ़ गया तो मुझे घर पर सच बताना पड़ा। बेटा बड़ा हुआ तो एक पुरानी मारुति कार ले ली। इसमें अस्थियां ले जानी शुरू कर दीं।

चंडीगढ़, पंचकूला और पानीपत, करनाल, शिमला और पटियाला सभी जगह जाकर अस्थियां एकत्र करना शुरू किया। इन अस्थियों को हरिद्वार ले जाकर विधि-विधान से पिंडदान करवाता रहा। 1995 से अभी तक 26 साल में लगभग 30 हजार मृत लोगों की अस्थियां विसर्जित कर चुका हूं। पूजा कराने के बाद जब गंगा में अस्थियां विसर्जित करता हूं तो मुझे एक तरह से रूहें जाती हुई नजर आती हैं।

यह रूहें मुझे कभी सिर पर तो कभी पीठ पर आशीर्वाद देती हुई प्रतीत होती हैं। कई बार तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। अब तो स्थिति यह है कि एक चक्कर में आठ से दस बोरी अस्थियां विसर्जन के लिए इक‌ट्‌ठी हो जाती हैं। इस नेक काम में अब बेटा और पत्नी नीलम भी मेरे साथ जाने लगे हैं। }शामलाल, रिटायर्ड इंस्पेक्टर, चंडीगढ़ पुलिस

800 लोगों की अस्थियां विसर्जित की हैं कोरोना काल में, इनमें से कुछ की कोरोना से मौत हुई थी

700 ऐसे मृतकों का संस्कार करवा चुके हैं, जो या तो लावारिस थे या गरीब थे

  • ट्राईसिटी के अलावा शिमला, पटियाला, करनाल, पानीपत और अन्य शहरों से अस्थियां एकत्र कर एकसाथ करते हैं हरिद्वार में विसर्जन
  • इस काम के लिए उन्होंने किसी से आज तक एक पैसा नहीं मांगा। डिपार्टमेंट से छुट्‌टी लेकर करते थे यह पुण्य का काम

कोरोना से मौत हो गई है, आप संस्कार करवा दें...
शामलाल ने कहा कि लॉकडाउन के तीन महीने के बाद मैंने फिर विसर्जन शुरू किया। एक परिवार का गाजियाबाद से फोन आया। कहा कि चंडीगढ़ में उनके परिवार के एक सदस्य की कोरोना से मौत हो गई है। आप संस्कार करवा दें। कोरोना की परवाह किए बगैर मैंने उस बॉडी का संस्कार करवाया। अस्थियां गंगा में प्रवाहित कीं।

ऐसे कई उदाहरण हैं। यह ऐसा समय था, जब लोग अपनों से मुंह मोड़ रहे थे। लेकिन मेरा तो मिशन था, इसलिए बिना डरे इसे निभाता रहा। आगे भी ये सेवा जारी रहेगी। मेरे इस मिशन में सेक्टर-25 श्मशानघाट के आचार्य गुलशन, आचार्य विजय और आचार्य गौरव का पूरा सहयोग रहता है।

‘मुक्ति’ के नाम से बना रहे हैं ट्रस्ट... शाम लाल कहते हैं कि वे अब एक ट्रस्ट बना रहे हैं। ट्रस्ट लावारिस व गरीब लोगों के घर में किसी का निधन होने पर संस्कार व पिंडदान का खर्च उठाएगा।

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