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नहीं रहे फ्लाइंग सिख:0.1 सेकेंड की कीमत मिल्खा सिंह से बेहतर कोई नहीं जान सकता; कहते थे- ‘ये दर्द मेरे जीवन के साथ ही खत्म होगा’

चंडीगढ़एक महीने पहलेलेखक: गौरव मारवाह
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गोल्ड और सिल्वर का फैसला भी फोटो फिनिश से हुआ था।
मिल्खा सिंह (भारत) 45.6 सेकेंड नेशनल रिकॉर्ड - Dainik Bhaskar
गोल्ड और सिल्वर का फैसला भी फोटो फिनिश से हुआ था। मिल्खा सिंह (भारत) 45.6 सेकेंड नेशनल रिकॉर्ड
  • 1929 नवंबर, 20 को पाकिस्तान के फैसला बाद में जन्म हुआ
  • 1947 खून खराबे के बीच विभाजन के बाद भारत आए

0.1 सेकंड कितनी देर का होता है? इसमें क्या कर सकते हैं, शायद एक बार आंख की पलक ही झपक सकते हैं इसकी कीमत क्या है? यह कीमत कोई और जाने या न जाने, लेकिन मिल्खा सिंह 0.1 सेकेंड की कीमत बखूबी जानते थे। यह वो अंतर है, जो मिल्खा के करियर में सबसे बड़ा अंतर पैदा करता था। रोम ओलिंपिक 6 सितंबर 1960 को उन्होंने 0.1 सेकंड के अंतर से मेडल मिस कर दिया था।

दक्षिण अफ्रीका के एथलीट मैल्कम स्पेंस ने वो दौड़ 45.5 सेकेंड में खत्म की थी और मिल्खा सिंह ने 45.6 सेकंेड में। वे ओलिंपिक में पोडियम फिनिश से 0.1 सेकेंड के अंतर से चूक गए थे, हालांकि उन्होंने नेशनल रिकॉर्ड बनाया जो चार दशकों तक कायम रहा। मिल्खा खुद इसे सबसे खराब यादगार मानते रहे हैं। उन्होंने कहा था- मेरी अंतिम इच्छा किसी भारतीय एथलीट को मेडल पहनते हुए देखने की है।

मिल्खा सिंह के करियर में साल 1958 सबसे बेहतरीन रहा। उन्होंने कटक नेशनल गेम्स में 200 मीटर और 400 मीटर में रिकॉर्ड बनाए, बाद में 1958 कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीता। साल के अंत में टोक्यो एशियन गेम्स में गोल्डन डबल (200 मीटर और 400 मीटर) हासिल किया।

1958 के कॉमनवेल्थ गेम्स का उनका मेडल ऐतिहासिक मेडल माना गया। उनके बाद 52 साल तक भारत को इंतजार करना पड़ा। इसके बाद डिस्कस थ्रोअर कृष्णा पूनिया ने 2010 में दिल्ली में गोल्ड जीता था।

तब आंख में सिर्फ आंसू थे

मिल्खा सिंह ने कार्डिफ आर्म्स पार्क में एक अरब उम्मीदों के साथ 400 मीटर की दौड़ में हिस्सा लिया। वहां उन्हें किसी का ज्यादा सपोर्ट नहीं था लेकिन मिल्खा सिंह को उम्मीद थी कि यहां राष्ट्रगान जरूर बजेगा। मिल्खा सिंह ने दक्षिण अफ्रीका के एथलीट को 0.3 सेकंड से पछाड़ा जबकि कैनेडा के चार्ल्स टेरेंस लोबो 47 सेकंड से पीछे किया।

उन्होंने उस मेडल के लिए कहा था- तब मेरी आंखों में आंसू थे, ये एक ऐसा पल था जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। मैं वहां द. अफ्रीका के वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर स्पेंस के साथ मुकाबला कर रहा था, जो उस समय 400 मीटर में बेस्ट थे।

इस जीत के बाद उन्हें पीएम जवाहरलाल नेहरू का फोन आया, मिल्खा सिंह के अनुरोध करने पर उन्होंने पूरे देश में अवकाश घोषित किया था ताकि सभी जीत का जश्न मना सकें। 1964 के टोक्यो ओलिंपिक में भाग लेने से पहले, मिल्खा सिंह ने 1962 में जकार्ता एशियन गेम्स में दो गोल्ड जीते थे।

संघर्ष से भरा रहा फ्लाइंग सिख का आगाज

बचपन का समय मिल्खा के लिए आसान नहीं था। पंजाब के गोविंदपुरा गांव(अब पाकिस्तान में) में एक सिख परिवार में पैदा हुए 14 अन्य भाई-बहनों के बीच।उनकी यादों में ताजा 1947 में विभाजन से पहले के दंगों के दौरान उनके माता-पिता और भाई-बहनों का नरसंहार देखा। वे दिल्ली आए और संघर्ष किया।

उन्होंने कहा था कि मैं बहुत छोटा था, लेकिन यादें अभी भी ताजा हैं। मैंने जीवन में केवल तीन बार आंसू बहाए थे, और वह अमानवीय नरसंहार तीनों में से पहला था। 1951 में वे सेना में भर्ती हुए। 400 मीटर के एथलीट बने और इंटर सर्विसेज में मेडल जीता। पांच साल के अंदर 1956 के मेलबर्न ओलिंपिक गेम्स में जगह बनाई।

रिकॉर्ड तोड़ने की हमेशा आग थी

मिल्खा ने 1956 के ओलिंपिक 400 मीटर चैंपियन अमेरिका के चार्ल्स जेनकिंस को फॉलो किया। उन्होंने कहा था- जेनकिंस के साथ इंग्लिश में बात करना बड़ी परेशानी थी, मैंने अपने एक दोस्त को ओलिंपिक चैंपियन से बात करने के लिए तैयार किया। जेनकिंस काफी अच्छे थे और उन्होंने अपनी डाइट से लेकर पूरे ट्रेनिंग शेड्यूल को लिखकर दिया।

मैंने एक कागज के टुकड़े पर उनकी ओलिंपिक टाइमिंग 46.7 लिखी और उसे लौटने पर गुरु नानक देव जी की तस्वीर के बगल में रखा। मैंने इसे अपना लक्ष्य बना लिया था, मुझे वहां तक पहुंचना था चाहे जो भी हो जाए। दो साल की बाद उन्होंने सच में उसे तोड़ा और 46.6 सेकंड का टाइम निकाला।

फ्लाइंग सिख ने ठुकरा दिया अर्जुन अवॉर्ड

मिल्खा सिंह को पद्मश्री दिए जाने के बाद अर्जुन अवॉर्ड के लिए चुना गया। उन्हें 2001 में ये अवॉर्ड दिया गया लेकिन उन्होंने इसे लेने से इंकार कर दिया। उन्होंने बाद में इसका कारण बताया। उन्होंने कहा था कि आजकल अवॉर्ड मंदिर में ‘प्रसाद’ की तरह बांटे जाते हैं।

पद्मश्री दिए जाने के बाद मुझे अर्जुन अवॉर्ड के लिए चुना गया, मैंने इसे लेने से इंकार कर दिया। ये मास्टर्स डिग्री हासिल करने के बाद एसएससी सर्टिफिकेट की पेशकश करने जैसा था। मिल्खा सिंह की रिटायरमेंट के बाद कई एथलीट्स ने पदक जीते हैं, लेकिन फ्लाइंग सिख की उपलब्धि हमेशा भारतीय खेल इतिहास में एक विशेष अध्याय रहेगी।

रोम ओलिंपिक्स 1960

मुकाबला 400 मीटर का। इस रेस में वो जीते नहीं, सिर्फ 0.1 सेकेंड से मेडल से चूके और चौथे स्थान पर रहे। लेकिन इस हार ने भी दुनिया को यह दिखा दिया कि ट्रैक एंड फील्ड में एक भारतीय क्या कुछ करने का माद्दा रखता है। भारतीय एथलेटिक्स के लिए इसे ‘वॉटरशेड मोमेंट’ कह सकते हैं।

उस दिन मिल्खा सिंह ने जो नेशनल रिकॉर्ड बनाया, वो 40 साल तक कायम रहा। एथलेटिक ट्रैक ही नहीं, जिंदगी की रेस भी उन्होंने बखूबी दौड़ी। विभाजन की त्रासदी से उबरने में वक्त तो लगा, लेकिन जिंदगी जीना उन्होंने छोड़ा नहीं।

1951 ईएमई, सिकंदराबाद में शामिल हुए, वे पहले से ही सेना में शामिल होना चाहते थे

  • 1953 ईएमई सेंटर में ट्रेनिंग लेने के बाद मिल्खा सिंह सेना में भर्ती किए गए
  • 1956 मेलबर्न में खेले गए ओलिंपिक गेम्स में उन्होंने भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व किया
  • 1958 टोक्यो एशियन गेम्स के 200 मीटर और 400 मीटर में गोल्ड जीता, पाकिस्तान अब्दुल खालिक को हराया
  • 1959 उनकी कामयाबी के बाद उन्हें चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म श्री से सम्मानित किया गया

1960 ओलिंपिक में एथलेटिक्स फाइनल में पहुंचने वाले पहले भारतीय बने, 400 मीटर में चाैथे स्थान पर रहे

  • 1962 जकार्ता एशियन गेम्स में 400 मीटर में गोल्ड मेडल हासिल किया
  • 1963 भारतीय विमन वॉलीबॉल टीम की पूर्व कप्तान निर्मल सैनी के साथ शादी की
  • 1993 पंजाब के डायरेक्टर स्पोर्ट्स(एजुकेशन) की पोस्ट से वे रिटायर हुए, कई साल इस पोस्ट पर काम किया
  • 2001 भारत में खेलों के लिए सर्वोच्च पुरस्कार अर्जुन पुरस्कार से उन्हें नवाजा गया, फ्लाइंग सिख ने इस अवॉर्ड को लेने से इंकार कर दिया
  • 2013 ऑटोबायोग्राफी(बेटी सोनिया सनवल्का को-ऑथर द रेस ऑफ माई लाइफ पब्लिश हुई, इसी साल भाग मिल्खा भाग नामक एक बायोपिक रिलीज हुई

गोल्फ को काफी वक्त देते थे

नियमों के पक्के थे मिल्खा सिंह- द्राेणाचार्य अवॉर्डी कोच मोहिंदर सिंह ढिल्लों को मिल्खा सिंह ने नहीं माना विजेता

चंडीगढ़. मिल्खा सिंह एक दिग्गज एथलीट और फाइटर हैं, इस बात को सभी जानते हैं। वे अपने नियम के भी पक्के थे। उन्होंने कभी नियमों के साथ समझौता नहीं किया और किसी एथलीट को करने भी नहीं दिया। उनके साथ एक ऐसी ही घटना साझा कर रहे हैं द्रोणाचार्य अवॉर्डी कोच मोहिंदर सिंह ढिल्लों। ढिल्लों नेशनल कोच हैं और इन दिनों शॉटपुट स्टार तजिंदर सिंह तूर के साथ काम कर रहे हैं।

ढिल्लों ने बीते वक्त को याद करते हुए कहा- 1982-83 की बात है, मैं चंडीगढ़ में इंटर स्टेट एथलेटिक्स चैंपियनशिप में हिस्सा लेने आया था। मेरा मेन इवेंट डिकैथलॉन था, लेकिन मैं वहां कई इवेंट में हिस्सा ले रहा था। मैंने डिस्कस थ्रो, जैवेलिन थ्रो आदि में गोल्ड जीता। इसके बाद इवेंट की अंतिम रेस 400 मीटर हर्डल थी। मैंने उसमें भी दौड़ने का मन बनाया और हीट में टॉप पर रहने के बाद मैं फाइनल में पहुंचा।

फाइनल जैसे ही शुरू हुए तभी वहां पर मिल्खा सिंह आए। वे इवेंट में चीफ गेस्ट के तौर पर पहुंचे थे। मैंने फाइनल रेस शुरू की और अच्छी खासी लीड बनाई। मैं सबसे आगे था लेकिन लास्ट हर्डल पर जंप करने के बाद मेरा दायां पैर लैंड किया और मेरा जूता फट गया। इससे मेरा बैलेंस बिगड़ा और मेरा बायां पैर साथ वाली लेन में चला गया। मैंने इस गलती को सुधारा और अगला पैर अपनी लेन में लेकर आया।

मैं पहले स्थान पर आया और वहां मौजूद ऑफिशियल्स ने मुझे गोल्ड मेडल के लिए चुना। मिल्खा सिंह को ये बात सही नहीं लगी और वे ऑफिशियल्स के पास आए, उन्होंने ऑफिशियल्स से कहा कि इस एथलीट ने दूसरी लेन में कदम रखा है और नियमों के अनुसार ये विजेता नहीं हो सकते।

मैंने उनसे कहा कि मेरी गलती नहीं है क्योंकि मेरा जूता फट गया था, लेकिन मिल्खा सिंह जी ने कहा कि नियम आपको इसकी इजाजत नहीं देता, गोल्ड मेडल इन्हें नहीं दिया जाना चाहिए। वे हमेशा नियमों के पक्के थे और मुझे हमेशा उनकी ये खासियत याद रहेगी।

मिल्खा सिंह को पाकिस्तान ने बनाया फ्लाइंग सिख

चंडीगढ़. 1947 में भारत पाक विभाजन के दौरान अपने माता-पिता और भाई-बहनों को खोने की बचपन की यादों से बाद मिल्खा सिंह को फिर से पाकिस्तान का दौरा करने को कहा गया था लेकिन तब उन्होंने दौरा करने से इंकार कर दिया था। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें मनाया जिसके बाद मिल्खा पाकिस्तान गए।

यहां उनका सामना अब्दुल खालिक- एशिया का तूफान से था। दोनों देशों की नजरें इस इवेंट पर थीं और इसे खालिक बनाम मिल्खा सिंह का नाम दिया गया था। रेस के बाद पाकिस्तान के दूसरे राष्ट्रपति जनरल अयूब खान ने मिल्खा से कहा, ‘मिल्खा, तुम पाकिस्तान आए और भागे नहीं, आपने वास्तव में पाकिस्तान में उड़ान भरी है।

पाकिस्तान आपको फ्लाइंग सिख की उपाधि देता है।’ मिल्खा सिंह को आज पूरी दुनिया में फ्लाइंग सिख के रूप में जाना जाता है, इसका क्रेडिट जनरल अयूब और पाकिस्तान को जाता है। उन्होंने मिल्खा सिंह को उनके हक का प्यार और सम्मान दिया।

द रेस अगेंस्ट टाइम​​​​​​- खालिक VS मिल्खा

200 मी. में पाकिस्तान के अब्दुल खालिक को दी मात

  • मिल्खा 21.6 सेकेंड
  • खालिक 21.7 सेकेंड

फ्लाइंग सिख के करियर की 5 बेस्ट रेस (400 मी.)

  • 45.6 सेकेंड के साथ मिल्खा सिंह ने रोम ओलिंपिक को खत्म किया, यहां भले ही उन्हें मेडल नहीं मिल पाया लेकिन उन्होंने नेशनल रिकॉर्ड बनाया, ये नेशनल रिकॉर्ड कई दशकों तक कोई तोड़ नहीं पाया
  • 45.8 सेकेंड के साथ मिल्खा सिंह ने रोम ओलिंपिक से पहले वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था, कुछ सूत्र बताते हैं कि उन्होंने फ्रांस में ये रिकॉर्ड बनाया था, बाद में ये रिकॉर्ड टूटा
  • 46.6 सेकेंड के साथ 1958 में मिल्खा सिंह ने कटक में आयोजित भारत के नेशनल गेम्स में 400 मीटर के लिए रिकॉर्ड बनाया और एशियन गेम्स में भी गोल्ड मेडल जीता
  • 46.6 सेकेंड फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह ने 1958 ब्रिटिश एम्पायर एंड कॉमनवेल्थ गेम्स में 400 मीटर का गोल्ड मेडल जीता, ये किसी भी भारतीय का गेम्स का पहला गोल्ड था
  • 46.9 सेकेंड मिल्खा सिंह ने 1962 एशियन गेम्स में 400 मीटर रेस का गोल्ड मेडल जीता, यहां पर उन्होंने दूसरा गोल्ड मेडल 400*4 मीटर रीले रेस में देश के लिए जीता था​​​​​​​

‘भाग मिल्खा भाग’ में अपनी कहानी देख रो पड़े थे

चंडीगढ़. मिल्खा सिंह ने अपनी लंबी जिंदगी में कई उतार चढ़ाव देखे लेकिन तीन मौके ऐसे थे जिन्होंने उन्हें रोने पर मजबूर कर दिया। पहली बार वे तब रोए जब उन्होंने पाकिस्तान में अपनों का कत्लेआम होते देखा। इसके बाद 1958 कॉमनवेल्थ गेम्स में देश को गोल्ड दिलाने के बाद वे रो पड़े और खुशी के मारे वे अपने आंसुओं को रोक नहीं पाए। तीसरा मौका तब आया जब उन्होंने अपने उपर फिल्माई गई स्टोरी ‘भाग मिल्खा भाग’ को देखा। फिल्म को देखकर उनकी यादें फिर से ताजा हो गईं और वे रो पड़े।

मिल्खा सिंह की आत्मकथा ‘द रेस ऑफ माई लाइफ’ पर आधारित उनकी बेटी सोनिया सनवल्का द्वारा लिखित फरहान अख्तर-स्टारर फिल्म एक बड़ी ब्लॉकबस्टर थी। मिल्खा सिंह ने 1 रुपए में फिल्म के राइट्स बेचे थे। इसमें एक क्लॉज था कि फिल्म की कमाई का 10-15 प्रतिशत हिस्सा उनकी चैरिटेबल ट्रस्ट को डोनेट किया जाएगा।

वे खुद फिल्म के शौकीन नहीं थे लेकिन उनकी कहानी को फिल्म के जरिए लोगों ने जरूर देखा। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्होंने आखिरी बार 1960 के दशक में एक फिल्म देखी थी और राकेश ओमप्रकाश मेहरा द्वारा निर्देशित अपनी ही बायोपिक देखने के लिए 2013 में 53 साल बाद थिएटर में लौटे। उन्होंने कहा कि मेरी किताब के विमोचन के बाद कई निर्देशकों ने एक फिल्म बनाने के लिए मुझसे संपर्क किया था।

मेरे बेटे (जीव) ने मेहरा की कुछ फिल्में देखी थीं और उसने एक रुपए में फिल्म के अधिकार देने का फैसला किया। मैंने समझौते में एक क्लॉज का का उल्लेख किया कि फिल्म जो प्रॉफिट कमाती है उसका 10-15 प्रतिशत हमारे ट्रस्ट को जाएगा।

पद्मश्री अवॉर्डी ने कहा था कि वे आखिरी बार 1960 में सुरैया और 1946 में नूरजहां-स्टारर अनमोल घड़ी को देखने के लिए थिएटर गए थे, लेकिन 2013 की बायोपिक ने निश्चित रूप से फ्लाइंग सिख के भावनात्मक पक्ष को सामने लाया। उन्होंने कहा था कि अपने शुरुआती दिनों को बड़े पर्दे पर देखने के लिए मैं फूट-फूट कर रो पड़ा।

फिल्म ने विभाजन की यादें ताजा कर दीं, जब मेरे पास नौकरी या पर्याप्त भोजन नहीं था। मेरे जीवन में शायद ये तीसरी बार था जब मेरे आंसू छलक पड़े। अन्य अवसर जब मैं रोया, विभाजन के दौरान मेरे माता-पिता और कुछ भाई-बहनों को मार डाला गया था और जब मैं रोम में एक सेकंड के अंश से ब्रॉन्ज मेडल से चूक गया था।

4 बार के एशियन गोल्ड मेडलिस्ट ने उम्मीद जताई थी कि उनकी बायोपिक एथलीटों की भावी पीढ़ी को “नेवर से डाई” के रवैये को अपनाने और सभी बाधाओं के खिलाफ देश का नाम रोशन करने के लिए प्रेरित करेगी। उन्होंने कहा था कि आप जीवन में कुछ भी हासिल कर सकते हैं।

ये तीसरा मौका था जब उनकी आंख में आंसू आए थे, एक रुपए में बेची थी उन्होंने अपनी फिल्म
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