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कुडियां दी लोहड़ी:बेटी के जन्म पर जश्न की परंपरा से चंडीगढ़ में आया बड़ा बदलाव; 5 साल में प्रति हजार 69 लड़कियां बढ़ीं

चंडीगढ़4 दिन पहले
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  • लोगों में बेटियों के प्रति तेजी से जागरुकता बढ़ी है, 2014 में 870 में थी अब 939 हो गई

माये नि सहनु दे लोहड़ी, अस्सा मल लई तेरी ड्योडी माये नि सहनु दे लोहड़ी, साडी आस न माये तोड़ी माये नि सहनु दे लोहड़ी, प्यार दी साहणु गचक खवा दे, नाम दा मीठा जीबा ते वसा दे, पा भिखियां साहणु थोड़ी, माये नि सहनु दे लोहड़ी। ये गीत गाते हुए हर साल 13 जनवरी को पंजाबी समाज लोहड़ी पर्व मनाता है। लोहड़ी किसी जाति-धर्म का त्योहार नहीं है, यह पूरे पंजाबी समाज का उत्सव है। जिस घर में बेटे का जन्म होता है, उस घर में जाकर लोग इस दिन उत्सव मनाते हैं, लेकिन अब यह जश्न बेटियों के जन्म पर भी होने लगा है।

दरअसल, बेटे के जन्म पर खुशी मनाने के साथ अब लोगों को उनके भविष्य की चिंता बढ़ गई थी। इसका कारण चंडीगढ़ और पंजाब में लड़के और लड़कियों के लिंगानुपात में भारी अंतर होना था। यह एक वक्त 734 प्रति हजार तक पहुंच गया था। अब बेटियों के जन्म पर खुशी का माहौल बनने यह आंकड़े तेजी से बदले हैं। पंजाब में इस समय 1000 हजार लड़कों पर 920 लड़कियों का अनुपात है। वहीं, चंडीगढ़ में 939 का लिंगानुपात है। बेटियों के संख्या में कमी आने पर लोगों को अपने बेटों शादियों की भी चिंता सताती है।

ऐसे मनाई जाती है लोहड़ी
लोहड़ी की रात खुली जगह पर आग जलाई जाती है। लोग लोकगीत गाते हुए नए धान के लावे के साथ खील, मक्का, गुड़, रेवड़ी, मूंगफली आदि आग को अर्पित कर परिक्रमा कर सुख-समृद्धि की कामना करते है। किसान इस मौके पर फसल की पूजा भी करते हैं। गन्ने की कटाई के बाद उससे बने गुड़ को इस त्योहार में इस्तेमाल किया जाता है।

यह भी है मान्यता
पंजाब में लोहड़ी का त्योहार दुल्ला भट्टी की भी मान्यता है। मुगल शासक अकबर के समय में दुल्ला भट्टी पंजाब में ग़रीबों के मददगार माने जाते थे। उस समय लड़कियों को गुलामी के लिए अमीरों को बेच दिया जाता था। कहा जाता है कि दुल्ला भट्टी ने ऐसी बहुत सी लड़कियों को मुक्त कराया और उनकी फिर शादी कराई। इसी वजह से लोहड़ी का पर्व मनाया जाने लगा।

अब कुडियां दी लोहड़ी
पंजाब में लगभग 2 दशक पहले लड़कियों की संख्या लड़कों के मुकाबले काफी कम हो गई थी। उस समय की सरकार ने लिंगानुपात को सही बनाए रखने को लेकर कुडियां दी लोहड़ी मनाने का आह्वान किया। सरकार ने लोगों को लड़के-लड़कियों में भेदभाव को खत्म करने के लिए जागरूक किया। इसके बाद बेटियों के जन्म के बाद भी घर में लोहड़ी की खुशियां मनाई जाने लगीं।

घर में लक्ष्मी आई इसलिए खुशी मनाई
सिविल हॉस्पिटल मोहाली में एक दिन की बेटी की मां हरप्रीत कौर ने कहा मेरी पहली संतान के रूप में बेटी हुई है। घर में बेटी के रूप में लक्ष्मी आई है। इसी खुशी में घर में लोहड़ी मनाई जा रही है। सुबीर अरोड़ा मोहाली के रहने वाले है, उनके घर भी बेटी का जन्म हुआ है। वह कहते हैं, अब बेटे-बेटियों में फर्क नहीं है। इसलिए हम बेटी के जन्म का जश्न भी लोहड़ी मना रहे हैं।

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