अभिनय / गुरु ने पूछा तुम्हें मरना आता है, मैंने मरने की एक्टिंग कर दी

The master asked you how to die, I acted to die
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The master asked you how to die, I acted to die

  • एक्टर नवदीप बाजवा ने अपनी एक्टिंग की जर्नी काे हमसे साझा किया।

दैनिक भास्कर

May 24, 2020, 05:00 AM IST

चंडीगढ़. जिस दिन अमरीश पुरी की मृत्यु हुई, उसी दिन मेरे दादा जी भी पूरे हो गए थे। उस दौरान पूरा देश शोक मना रहा था। मेरे दादा जी के लिए नहीं, बल्कि अमरीश सर के लिए। यूं तो हम अपने स्तर पर मुकम्मल होते हैं, मेरे दादा जी भी थे। आज हम जो हैं, उन्हीं की बदौलत ही हैं। मगर, उस दिन मैंने तय कर लिया था कि मैं गुमनामी में नहीं मरूंगा। कुछ ऐसा करना है, जिसको दुनिया याद रखे। मेरे जीते जी भी और मरने के बाद भी। फिर मैंने सोचना शुरू किया कि ऐसा क्या है जिसके जरिए मैं अपनी पहचान बना सकता हूं। बहुत भटकने के बाद जो रास्ता दिखा वह एक्टिंग था। यह बता रहे हैं एक्टर नवदीप बाजवा। नवदीप खिदो खूंडि, निक्का जैलदार आदि पंजाबी फिल्माें का हिस्सा बन चुके हैं। अपनी शुरुआत को लेकर बोले - मेरे पापा आर्मी से हैं। जैसे कि होता ही है कि आर्मी वाले का बच्चा आर्मी में जाएगा।

मैंने भी कोशिश की, मगर दौड़ में हमेशा रह गया। अगर अपनी पढ़ाई की बात करूं तो मैंने चंडीगढ़ के खालसा कॉलेज से पढ़ाई की। मेडिकल में लैब टेक्नीशियन का कोर्स भी किया हुआ है। कुछ वक्त जॉब भी की। मगर मंजिल ही एक्टिंग थी, तो इसने अपनी ओर खींच ही लिया। यूं तो मैंने बारहवीं के बाद ही घर पर बताया था कि मैं एक्टर बनना चाहता हूं, मगर पापा ने समझाया कि पहले बैकअप प्लान तैयार करो। इसीलिए पढ़ाई की और काम भी। एक्टिंग में प्रोफेशनल ट्रेनिंग को लेकर बताया - मैंने थिएटर किया है। अब भी करता हूं। 2015 में मैं थिएटर फॉर थिएटर ग्रुप पहुंचा और सुदेश शर्मा को अपना गुरु मान लिया।

पहले छह महीने में तो प्रैक्टिस होती थी और घर आ जाता था। फिर धीरे-धीरे प्ले में छोटे मोटे रोल मिलने शुरू हो गए। उसके बाद मैंने पहला प्ले किया- गाथा श्री आनंदपुर साहिब दी। एक बार हुआ यूं कि सुदेश सर ने पूछा कि क्या तुम्हें मरना आता है। मैंने कहा-हां और मरने की एक्टिंग की। तो वे बोले - वाह भई! तू तो मरता बहुत अच्छा है और नाटक के लिए चुन लिया। थिएटर करते वक़्त मैंने बनिंदर बन्नी सर का इंपैक्ट आर्ट्स थिएटर ग्रुप ज्वाइन कर लिया था। उनके साथ नाटक करने के साथ साथ बच्चों को सिखाता भी हूं। 

मम्मी ने मुझे बहुत कुछ सिखा दिया है

लॉकडाउन में यूं तो मैंने बहुत कुछ सीखा है। मगर मैं मानता हूं कि सीखने से ज्यादा अगर आपको एहसास होता है किसी बात का, तो उससे बेहतर सीख नहीं मिल सकती। बचपन से स्कूल, फिर ट्यूशन, खेल कूद ऐसे ही समय बीतता गया। फिर बड़ा हुआ तो कॉलेज, जॉब आदि। कभी जान ही नहीं पाया कि मां कैसे रहती होंगी। अब लॉकडाउन में जब सारा समय घर पर रहता हूं तो समझ पाया हूं कि मां तो सारा दिन ही काम में लगी रहती हैं। जब यह समझा तो बुरा लगा। और सोचा कि कैसे मम्मी को खुशी दूं। अब मैं मम्मी के साथ खाना बनाता हूं। मम्मी ने मुझे बहुत कुछ सिखा दिया है।

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