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  • The Same Effort Of 'Sampathis Ki Ram' That Came Clean Breath, Performed 1250 Rites And Treatment Of 1100 In 9 Years

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नेशनल बर्ड डे पर विशेष:‘संपातियों के इस राम’ का एक ही प्रयास कि स्वच्छ आए सांस, 9 साल में किया 1250 का संस्कार और 1100 का इलाज

चंडीगढ़2 महीने पहले
अपने परिवार और परिजनों के साथ मृत पक्षियों की आत्मा की शांति के लिए हवन करते प्रिंस मेहरा।
  • मंगलवार को चंडीगढ़ के सेक्टर 35 में प्रिंस मेहरा ने अपने घर पक्षियों की आत्मा की शांति के लिए एक हवन का आयोजन किया

(आरती एम अग्निहोत्री). आज राष्ट्रीय पक्षी दिवस है। इस खास दिन पर हम परिंदों के लिए खास काम करने वाले एक शख्स की कहानी से रू-ब-रू करवा रहे हैं। घर की सुंदरता बढ़ाने और अपने मन को हर्षाने के लिए तरह-तरह के पक्षियों को पालने वाले तो बहुत देखे-सुने होंगे। मगर यह शख्स पिछले 9 साल में मर चुके 1250 पक्षियों का विधिवत अंतिम संस्कार 1100 का इलाज कर चुके हैं। इनकी इसी अलग सोच ने इन्हें ‘‘संपातियों का राम’(जिस तरह से वनवास के दौरान भगवान श्री राम ने गिद्धराज संपाती का अंतिम संस्कार और पिंड दान किया था,ठीक वैसे ही यह भी कर रहे हैं) बना दिया। आइए जानते हैं, कहां से शुरू हुआ यह कारवां

मंगलवार को चंडीगढ़ के सेक्टर 35 में प्रिंस मेहरा ने अपने घर पर एक हवन का आयोजन कर रखा था। उद्देश्य अपनी और अपने परिवार की सुख-शांति नहीं, बल्कि उन रुहों को शांति दिलाना था जो पखेरुओं के रूप में इस संस्कार में विचरण करके हरि के धाम लौट गईं। इसी दौरान दैनिक भास्कर से खास बातचीत में प्रिंस ने बताया कि किस तरह उन्होंने यह सब शुरू किया और उसके पीछे क्या वजह थी।

अपनी साइकिल बर्ड एंबुलेंस के साथ प्रिंस मेहरा।
अपनी साइकिल बर्ड एंबुलेंस के साथ प्रिंस मेहरा।

बकौल प्रिंस बात 2011 की है जब मैं सिटी बेस्ड NGO युवसत्ता के साथ काम कर रहे थे। इस दौरान वे गरीब बच्चों को पंजाब के फिरोजपुर में चार दिवसीय आर्मी अचीवमेंट कैंप लेकर गए। यहां जब रात को वह खाना खाने जा रहे थे तो देखा कि एक स्वीपर मृत कबूतर को डस्टबिन में डाल रही थी। मैंने उससे कबूतर को डस्टबिन में डालने की वजह पूछी तो पता चला कि वह करंट लगने से मर गया है। स्वीपर ने बताया कि सुबह भी एक कबूतर ऐसे ही मर गया था और उसे भी उसने डस्टबिन में डाल दिया था। इसके बाद मैंने उसे दोनों कबूतर डस्टबिन से निकालकर मुझे देने को कहा और फिर मैंने उन्हें मिट्‌टी में दबाकर उनका संस्कार कर दिया।

इसके बाद रात को सोते वक्त सोचा कि अगर इन कबूतरों को कूड़े में फेंक दिया जाता तो आगे फिर ये कूड़े में ही जाते। फिर इनसे जो बदबू आती उससे पर्यावरण को तो नुकसान होता ही, साथ ही सांस के जरिए इंसानों और दूसरे पशु-पक्षियाें के अंदर जाती और उससे बीमारी फैलती। फिर सोचा कि इनकी भी तो आत्मा हाेती हाेगी। इस तरह मरने से क्या उनकी आत्मा को शांति मिलती होगी?

मृत पंछी का संस्कार करते प्रिंस मेहरा।
मृत पंछी का संस्कार करते प्रिंस मेहरा।

यही विचार चार दिन मेरे जहन में घूमते रहे और वापिस आकर मैंने पैंफलेट छपवाए कि जिन लोगों को भी उड़ने वाले पंछी घायल या मृत मिलते हैं, वह मुझे कॉन्टैक्ट करें। इन पैंफलेट्स को स्कूलों के बाहर और मार्केटों में लगाया। सबसे पहले मुझे मृत गिलहरी की सूचना मिली, इसके बाद मुझे पंछियों की सूचना मिलने लगीं। तब से ये सिलसिला जारी है। शुरुआत में मेरे परिवार के लोग कहते थे कि आप कहीं खुद को कोई बीमारी न लगवा लेना। उनकी बात सुनकर मैंने दस्ताने पहनकर काम करना शुरू कर दिया लेकिन धीरे-धीरे सब इग्नोर कर दिया और सोचा कि जो होना है हो जाए। अब मेरे बच्चे मेरा इस काम में साथ देते हैं।

लोग होते थे हैरान

शुरुआत में जब मैं पक्षियों का इलाज और संस्कार करने लगा तो लोग हैरान होते थे। मेरी फोटो क्लिक करते थे और वीडियो भी शूट करते थे। पहली बार हवन करवाया तो पंडित भी मेरे उद्देश्य से हैरान हुआ, लेकिन बाद में मेरी सराहना की। मेरे पास पंछियों के लिए एक साइकिल एंबुलेंस थी। 2014 में एक बैंक ने मुझे ई-बाइक गिफ्ट की जिसे मैं एमरजेंसी में एंबुलेंस के तौर पर इस्तेमाल करता हूं। एंबुलेंस में खुरपा और पाउडर रखते हैं।

पर्यावरण को संतुलित बनाने में देते हैं योगदान

पंछियाें की चहचहाहट माहौल काे पॉजिटिव बना देती है। रंग-बिरंगे खूबसूरत पंछियाें को देखते हैं तो मन को खुशी मिलती है। दुख हाेता है जब ये बेवजह और असमय ही मर जाते हैं। लाेगाें काे समझना चाहिए कि पर्यावरण काे संतुलित रखने में यह कितना याेगदान देते हैं। इसलिए मेरी कोशिश रहती है कि लोगों काे मोटिवेट करूं और हर माध्यम से इनके सहयोग के बारे में बताऊं। पर्यावरण की वजह से हम हैं और इसेे संतुलित रखने में पेड़-पौधे, पशुओं व पंछियाें का अहम योगदान होता है। इसलिए जरूरी है कि इनके लिए कुछ किया जाए ताकि इनकी चहचहाहट में कोई कमी ना आए। थोड़े से प्रयास और आदतों में थोड़ा बदलाव कर यह संभव है। उन्हाेंने बताया कि कई बार करंट लगने से उनके नीचे का हिस्सा जल जाता है तो कभी पंख जले हाेते हैं। पतंग की डोर से भी पंख कटे जाते हैं। इनमें कबूतर सबसे ज्यादा होते हैं, कौए और कुछ माइग्रेटरी बर्ड्स भी होते हैं।

ई-बाइक एंबुलेंस पर प्रिंस मेहरा।
ई-बाइक एंबुलेंस पर प्रिंस मेहरा।

मिल चुके हैं कई अवॉर्ड

प्रिंस मेहरा सेक्टर-38 स्थित SPCA में एनिमल अटेंडेट के तौर पर काम करते हैं। अपने इस काम के लिए 2015 में इनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज हो चुका है। इनके पास 28 वर्ल्ड और 6 नेशनल अवॉर्ड हैं। साल 2016 में इन्हें स्टेट अवॉर्ड से भी नवाजा जा चुका है।

इस वजह से बेवजह व असमय मर जाते हैं पंछी

  • करंट लगने व गर्मियों में पानी न मिलने से मर जाते हैं
  • गुलेल का निशाना बन जाते हैं
  • एग्जॉस्ट फैन के पास ज्यादातर कबूतरों ने घोंसले बनाए हाेते हैं और फैन चलने पर यह कट जाते हैं
  • पतंग की डोर से भी पंछी मर जाते हैं

ऐसे रखें इनका ख्याल

  • पानी के साथ दाना भी इनके लिए रखा जाए
  • पटाखों की वजह से भी कई पंछी घायल हो जाते हैं, इसलिए इस आदत को बदलें
  • दुकान व अन्य जगह पर जब फैन चलाएं तो एक बार देख लें कि पंछी है या नहीं
  • गर्मियों में लोग घर के बाहर या छत पर पानी से भरा बर्तन रखते हैं, जरूरत है हर एक ऐसे योगदान दें
  • जो लोग मस्ती में या जान बूझकर गुलेल का निशाना इन पंछियों को बनाते हैं वह ऐसा न करें

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