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  • The tricolor was waved on foreign soil for the first time in the 1948 Olympics, considered it the best moment of life

हॉकी के सुल्तान / बलबीर सिंह सीनियर ने एक साल बाद देश की आजादी महसूस की थी, जिनके रहे गुलाम उन्हें ही मैदान में परास्त कर ओलंपिक में दिलाया गोल्ड

बलबीर सिंह सीनियर हर समय युवाओं को प्रेरित करते रहे और उन्हें देश के लिए अच्छा काम करने के लिए कहते रहे। फाइल फोटो बलबीर सिंह सीनियर हर समय युवाओं को प्रेरित करते रहे और उन्हें देश के लिए अच्छा काम करने के लिए कहते रहे। फाइल फोटो
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बलबीर सिंह सीनियर हर समय युवाओं को प्रेरित करते रहे और उन्हें देश के लिए अच्छा काम करने के लिए कहते रहे। फाइल फोटोबलबीर सिंह सीनियर हर समय युवाओं को प्रेरित करते रहे और उन्हें देश के लिए अच्छा काम करने के लिए कहते रहे। फाइल फोटो

  • दुनिया के बेस्ट सेंटर फॉरवर्ड में शुमार थे सीनियर
  • तीन ओलंपिक खेलने वाली टीम के हिस्सा रहे
  • 1952 में छह में से पांच गोल सीनियर के दागने का गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड

दैनिक भास्कर

May 25, 2020, 10:57 AM IST

चंडीगढ़. (गौरव मरवाहा). विश्व हॉकी के सुल्तान कहे जाने वाले पंजाब के दिग्गज हॉकी खिलाड़ी बलबीर सिंह सीनियर की 96 वर्ष की आयु में सोमवार सुबह मोहाली के फोर्टिस अस्पताल में आखिरी सांस ली। इस बीच वे अपने परिवार के साथ चंडीगढ़ में रह रहे थे। सीनियर के तीन बेटे और एक बेटी हैं। सीनियर हॉकी के ऐसे खिलाड़ी रहें, जो जब मैदान में होते थे तो सामने वाली टीम जबरदस्त दबाव में होती थी। सीनियर उस टीम का हिस्सा रहे हैं, जिसने तीन ओलंपिक में भारत को गोल्ड पाने का गर्व हासिल किया।

देश 15 अगस्त, 1947 को आजाद हुआ, लेकिन दिग्गज हॉकी खिलाड़ी बलबीर सिंह सीनियर ने करीब एक साल बाद 12 अगस्त-1948 को आजाद महसूस किया। यह वो दिन था, जब भारत ने ब्रिटेन को 4-0 से हराकर ओलंपिक गोल्ड जीता था। ये दिन इसलिए खास था, क्योंकि आजाद भारत का ये पहला गोल्ड था। वो लम्हा जब पहली बार भारत का तिरंगा झंडा कहीं फहराया गया। वो गर्व का पल था और उसी को बलबीर सिंह सीनियर ने हमेशा अपने अंदर संजोये रखा। उनका कहना था, उस दिन मैंने अपने आप को आजाद महसूस किया। जिस देश ने आपके ऊपर कई वर्षों तक राज किया, उसी देश को हराने के बाद, उनके सामने आपका तिरंगा लहराया जा रहा था। उन लम्हों को मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता। ऐसा लग रहा था कि मैं तिरंगे के साथ ही उड़ रहा हूं।

सीनियर के किस्से जो युवाओं को मोटिवेट करेंगे

बलबीर सीनियर के कॅरियर के लाखों किस्से रहे जो युवाओं को मोटिवेट करते रहेंगे, लेकिन दुख है कि अब वो किस्से सुनाने के लिए वो नहीं रहे। बलबीर सिंह सीनियर का देहांत फोर्टिस अस्पताल में लंबी बीमारी के कारण हो गया। कुछ समय पहले 108 दिन उन्होंने पीजीआई में बिताए और वे वहां से जीत कर घर लौटे, लेकिन ये पहला मौका था कि वे हार गए। वे हारे और देश ने अपना एक बड़ा और चमकता हुआ सितारा खो दिया। वे देश के सबसे बड़े खिलाड़ी के साथ साथ दुनिया के बेस्ट सेंटर फॉरवर्ड थे, जिसका रिकॉर्ड आज भी कायम है। मॉर्डन हॉकी का कोई भी खिलाड़ी उनके रिकॉर्ड को तोड़ नहीं पाया है। ये रिकॉर्ड उन्होंने 1952 ओलंपिक में गोल्ड जीतकर कायम किया था। उन्होंने फाइनल में 6 में से 5 गोल मारे थे और उनका ये रिकॉर्ड आज भी गिनीज बुक में कायम है।

हमेशा हॉकी के साथ जुड़े रहे

रिटायरमेंट के बाद बलबीर सीनियर हॉकी से अलग नहीं हो सके और उन्होंने 1971 में पहली बार भारतीय टीम के साथ काम किया। वे टीम के मैनेजर थे और पहली बार वर्ल्ड कप के लिए भेजी गई टीम के साथ उन्हें भेजा गया। भारतीय टीम ने वहां पर गोल्ड मेडल मिस किया और ब्रॉन्ज मेडल से ही टीम को संतोष करना पड़ा। इसके बाद 1975 में वर्ल्ड कप के लिए गई टीम में फिर से बलबीर सीनियर को ही मैनेजर बनाया गया। यहां पर टीम ने गोल्ड जीता और ये भारत का एकमात्र वर्ल्ड कप गोल्ड है। 1982 में नई दिल्ली में हुए एशियाई खेलों की मशाल जलाने का सम्मान भी बलबीर सिंह को दिया गया।

यंगस्टर्स के लिए भी किया काम

बलबीर सिंह सीनियर ने यंगस्टर्स के लिए भी काफी काम किया। पंजाब स्टेट स्पोर्ट्स काउंसिल और डायरेक्टर ऑफ स्पोर्ट्स, पंजाब के सचिव के पद भी काम किया। 1992 में वे पंजाब सरकार से रिटायर हुए। 1997 में उनकी ऑटोबायोग्राफी भी पब्लिश हुई। इसका नाम ‘द गोल्डन हैटट्रिक’ था। 2008 में उनकी दूसरी बुक ‘The Golden Yardstick: In Quest of Hockey Excellence’ पब्लिश हुई। 2019 में पंजाब सरकार ने उन्हें महाराजा रणजीत सिंह अवॉर्ड से सम्मानित किया। ये पंजाब सरकार का सबसे बड़ा खेल सम्मान है। उनके लिए सर्वोच्च भारतीय सम्मान खेल रत्न की भी मांग पंजाब सरकार लगातार करती रही।

डाॅक्टर बेटी से बात की

पिछले दिनों ही सीनियर के परिवार की ओर से बताया गया था कि अमेरिका में डॉक्टर बेटी इन दिनों कोरोना पॉजिटिव मरीजों का इलाज कर रही हैं, उनके फोन पर काफी देर तक बातें की थीं और उन्हें अच्छा काम करने के लिए कहा था।

ये थी खासियत

सेंटर फॉरवर्ड पोजिशन से खेलते हुए सीनियर मैदान पर हर समय चौकन्ने रहते थे और मौका लगते ही विपक्षी टीम के गोलपोस्ट में गेंद डाल देते थे। अपनी जांबाजी, तेज तर्रार हॉकी खेलने और विपक्षी टीम पर ताबड़तोड़ हमले कर जीत हासिल कर भारतीय हॉकी टीम को तीन बार ऑलंपिक गोल्ड मेडल जीतने वाली टीम के सदस्य रहे थे। लंदन 1948, हेल्सिंकी 1952,मेलबोर्न 1956 में हुए ऑलंपिक में वे अपने खेल से सभी को चकित कर दिया था।

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